उनके मुख – मंडल पे सयुंक्ता का सौम्य था


वो नजरों के इसारें,
किताबों के बहाने,
वो सखियों संग चहकना।
वो देर तक प्र्रांगण में रुके रहना,
टूटे चपल के बहाने।
उस प्रेम – प्रसंग का भी एक अपना दौर था,
जिसका नायक था मैं, चौहान सा,
और उनके मुख पे, सयुंक्ता का मान था.

वो कई – कई हफ्ते गुजर जाना,
बिना मिले।
और मिलने पे,
बिना संवाद के,पल का गुजर जाना।
वो उनका बिना पसीने के,
मुख को दुप्पटे से पोछना।
और आते – जाते लोगो के मुख को,
आँखों से तकना।
उस प्रेम – प्रसंग का भी एक अपना दौर था,
जिसका नायक था मैं, चौहान सा,
और उनके मुख – मंडल पे चाँद सक्क्षात था.

हरबराहट- घबराहट में,
उनके अंगों से मेरा छू जाना।
एक बिजली कोंध जाती थी,
जिसपे उनका पीछे हट जाना।
उस प्रेम – प्रसंग का भी एक दौर था,
जिसका नायक मैं, उग्र था चौहान सा,
और उनके मुख – मंडल पे सयुंक्ता का सौम्य था.

वो रक्त-रंजीत मुख पे,
नैनों का झुक जाना।
वो कम्पित – साँसों के प्रवाह से,
उनके वक्षों का उन्नत हो जाना।
उस प्रेम – प्रसंग का भी एक अपना दौर था,
जिसका नायक था मैं, व्याकुल चौहान सा,
उनके मुख – मंडल पे, भय से ग्रसित प्रेम – गुहार था.

 

यादे ह्रदय को छत – विछत कर देती हैं,
लेकिन यादें सुखद हो तो, गम मिटाने का काम करती हैं.

 

परमीत सिंह धुरंधर

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