Crassa के शयनकक्ष के झरोखे से : भाग – प्रथम


मैं बिस्तर पे बैठे कुछ पढ़ रहा था. तभी दरवाजा खोलते ही रश्मि दरवाजे पे ही ठिठक गयी. चौंकते हुए, आवाज में खीज की खरास रख कर वो बोली, “अरे ८ बजे ही चढ़ गए.”
मैंने देखते हुए उसे कहा, ” हाँ मुझे बहुत नींद आ रही है. तुम भी आ जाओ, जल्दी सोते हैं.”
रश्मि, “सब जानती हूँ मैं तुम्हारी नींद को. ३ बजे तक ना सोओगे खुद, ना सोने दोगे किसी को. हर रोज का एक ही आदत है. मैं नहीं आउंगी, बहुत काम है मुझे।”

उसके बाद रश्मि दर्पण के सामने बैठ के श्रृंगार करने लगी. मुझे पता है अब वो दो – तीन घंटे तक नहीं उठने वाली। पर ये नहीं समझ पाया की ये रात में श्रृंगार करती क्यों है? बाकी सारी औरत जन दिन में करती है, कहीं जाने पे करती हैं. आखिर धीरज खोकर मैंने आज पूछ ही लिया, ” ये तुम रोज रात में इतना सजती – सवरती क्यों हो, किसके लिए? बाकी लोग तो दिन में बाहर जाने पे श्रृंगार करती हैं.”
रश्मि,”ओह्ह्ह हो, तो अब दूसरे का श्रृंगार देखा जा रहा है की कौन कब सज रहा है? मैं तुम्हारी तरह नहीं हूँ जो दुसरो को देखूं और दिखाऊं।”
मैं, “अरे मैं तो बस ये नहीं समझ पता हूँ की तुम यहाँ बैठ के बिस्तर पे श्रृंगार क्यों नहीं करती। और ये मैं बुला रहा हूँ तो भी अब चार – चार घंटे तुम पता नहीं क्या करती हो? मुझे नींद आ रही है. सो जाऊँगा फिर.”
रश्मि, “सो जावों, मुझे बहुत काम हैं.”
आखिर मैं सो गया और पता नहीं रश्मि कब आकर लेट गयी.

अगले दिन, मैंने शाम को दोस्तों के साथ कुछ प्रोग्राम बनाया। जैसे ही आज जल्दी निकला ऑफिस से, तीन बजे, ताकि दोस्तों को सहूलियत रहे उनके घर जाने में भी, वैसे ही रश्मि का फ़ोन आ गया.
मैं, “हाँ, बोलो।”
रश्मि, “अरे तबियत तो ठीक है.” मैंने कहा की हाँ ठीक हूँ, मुझे क्या हुआ?
रश्मि,”तो ऐसे क्यों बोल रहे हो? नींद पूरी हई थी न तुम्हारी रात को.”
मैं, “हाँ मैं तो ११ बजे सो गया था. फिर क्यों पूरी नहीं होगी?”
थोड़ी देर शांत रहकर उसने कहा की अच्छा आज जल्दी घर आ जावों। मैंने कहा की मैं जल्दी आकर क्या करूँगा? मैंने उसे बोला की आज दोस्तों के साथ प्रोग्राम बन गया है, इसलिए मैं उनसे मिलने जा रहा हूँ.
मैं, “और वैसे भी तुम को बहुत काम रहता है. सो तुम उन्हें निपटा लो, तब तक मैं आ जाऊँगा।”
रश्मि, “अरे, मैंने आज सब काम जल्दी ख़तम कर दिया है. सोचा, तुम रोज कह रहे हो, तो आज तुमसे बाते करुँगी और जल्दी सो जाउंगी। वैसे भी तुम्हारे चलते रोज सो नहीं पाती।”
मैं, “मेरे चलते या तुम खुद ही लेट से सोती हो.”
रश्मि,”अरे तो कोई क्या करे? तुम्हारी तरह बिस्तर पे शाम से ही कब्जा कर लूँ और लड़ूँ तुमसे।”

रश्मि,”देखो मैंने, खाना बना दिया है आज तुम्हारे लिए. जल्दी – जल्दी किया, मेरा पूरा शरीर दुःख रहा है. ताकत नहीं है की रात भर बैठ कर तुम्हारा इंतज़ार करू। मैंने सब काम करने के चक्कर में आज दोपहर का खाना भी नहीं खाया की एकसाथ अब रात को तुम्हारे साथ ही खा लुंगी।”
रश्मि,”लेकिन तुम्हे ना मेरा ख्याल है ना प्यार। चलो, दोस्तों के साथ मजे करों, यहाँ बीबी मरे तो मरे. हाँ और सुनो, आज रात उन्ही के साथ रुक जाना, या होटल में सो जाना।”

आश्चर्य में पड़ते हुए, मैंने पूछा ये क्यों?
रश्मि, “अरे बोली तो, आज पूरा शरीर टूट रहा है. लगता है की नींद नहीं टूटेगी, इतनी थकी हूँ की, और मैं दरवाजा नहीं खोल पाउंगी। तुम्हारे लिए बोल रहीं हूँ की ताकि तुम्हे रात में दिक्कत ना हो बाहर खड़े रहने में.”
रश्मि,”कोई अपने यार को नहीं बुलाया है तुम्हारी तरह, जो तुम्हे घर आने से मना कर रही हूँ.”
और ये कहते ही फ़ोन रख दिया उसने। पांच मिनट सोच के मैंने दोस्तों को सूचित किया रश्मि की तबियत बिगड़ गयी है. मैंने उनसे माफ़ी मांगी ये कह कर की मुझे उसे डॉक्टर के पास ले के जाना है.
वापस घर जाने के लिए निकल पड़ा. मुझे पता है आज बिस्तर पे ५ बजे से बैठना पड़ेगा और उसका श्रृंगार आज ५ बजे से ही शुरू हो जाएगा।

मन मेरा ये ही सोच रहा था की जाने कैसे इस औरत को हर बार पता चल जाता है की मैंने कोई और प्रोग्राम बनाया था और बहार जा रहा हूँ.

 

परमीत सिंह धुरंधर

Leave a Reply

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out /  Change )

Google photo

You are commenting using your Google account. Log Out /  Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out /  Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out /  Change )

Connecting to %s