चाहे रख दी चोली खोलके


सैया माँगता दाल पे आचार
घी, दही सजाव छोड़ के.
का से कहीं दिल के बात सखी
आपन लोक-लाज – शर्म छोड़ के.

सांझे के सेजिया पे पसर जालन
कतनो बैठीं श्रृंगार करके।
सैयां निकलल बाटे नादान
का से कहीं, लोक-लाज – शर्म छोड़ के.

तनको ना छुए मिष्ठान
चाहे रख दी चोली खोलके।
तूड़ देहलन सारा दिल के अरमान
का से कहीं, लोक-लाज – शर्म छोड़ के.

 

परमीत सिंह धुरंधर

Leave a Reply

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out /  Change )

Google photo

You are commenting using your Google account. Log Out /  Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out /  Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out /  Change )

Connecting to %s