मैं कोमल – कुमुदुनी हूँ


ना खेलो मेरे ह्रदय से
मैं कोमल – कुमुदुनी हूँ.

अपना बना लो मुझे
आतुर मैं प्रचंड अग्नि हूँ.

व्यर्थ न करो मेरे तन – मन को
मैं तुम्हारी जीवन – संगिनी हूँ.

क्या प्राप्त कर लो गे, गंगा-पुत्र?
इस प्रतिज्ञा को पाल कर.
भीष्म तो बन जाओगे
पर मैं तुम्हारी अधूरी – जिंदगी हूँ.

मेरी साँसों में प्रवाहित हो तुम
मैं ही तुम्हारी अर्धांगिनी हूँ.

परमीत सिंह धुरंधर

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