श्री हरी विष्णु


तुम करुणामयी भक्तवत्सल
तुम धर्म का आधार हो.
सर्वव्यापी, निरंतर, अचर-अगोचर तुम
तुम सनातन साकार हो.
मैं मुर्ख -अज्ञानी – पापी
मुझे क्षमा करो, मेरा उधार हो.
सृष्टि के आदिकर्ता, पालक – संहारक तुम
तुम ब्रह्म निराकार हो.
जीव – अजीव सब तुममे समाहित
तुम कण – कण में विराजमान हो.

परमीत सिंह धुरंधर

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