घूमेंगे शहरिया बैठ के टमटम


पिया मोरे आगे – आगे
आ पीछे – पीछे हम.
घूमेंगे शहरिया बैठ के टमटम।

पिया मोरे भोले-भाले
और मैं चतुर दुल्हन।
देखेंगे शहरिया बैठ के टमटम।

घोड़ा दौड़े सरपट – सरपट
ठंठी – मीठी बहे रे पवन.
घूमेंगे नगरिया बैठ के टमटम।

पिया मोरे गोरे -गोरे
आ काले – काले हम.
देखेंगें शहरिया बजाके प्याल छम-छम.

मेरे एक नजर पे
बहके उनके हर कदम.
देखेंगें नगरिया बनके हमदम।

नैन मेरे चंचल
और मैं नटखट।
घूमेंगे नगरिया उठाके घूँघट।

पिया मोरे आगे – आगे
आ पीछे – पीछे हम.
घूमेंगे शहरिया बैठ के टमटम।

The poem is written for the Cabriolet which was once cultural part of Bihar. I have memories still fresh in mind. I had enjoyed it whenever I went to Katihar during my childhood.

परमीत सिंह धुरंधर

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