द्रौपदी चुनती है


सूर्य सा भाल, कौन्तेय का रूप
फिर भी धरा पे ना बंधू ना कुटुंब।
अपना ही तेज है, अपना ही बल
फिर भी सभा में, पल-पल,
क्षण-क्षण, अपमान का घूंट।

वीर के धैर्य का ना कर रण में सामना
पूछते हैं सभी केवल उसका वंश-कुल.
किस्मत के सहारे कब -कहाँ?
हुआ है कोई पौरष हाँ उदित।
पर भाग्य का ऐसा भी होता है एक दंश
ह्रदय, शौर्य ठुकराकर
द्रौपदी चुनती है कुरुवंश का दीप.

Rifle Singh Dhurandhar

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