छपरा की बैठकी


मुझे छोड़ गए बलमा
एक प्यास जगाकर।
सुलगती रही सारी रात
मैं एक आस लगाकर।

काजल भी न बहा
न टुटा ही गजरा।
उड़ गया वो भौंरा
अपनी जात बताकर।

कोई संदेसा पीठा दो
उस हरजाई Crassa को.
न ऐसे छले
हाय, दिल लगाकर।

जाने क्या मिलता है
छपरा की बैठकी में.
की भूल गए तुम हमें
अपनी लुगाई बनाकर।

परमीत सिंह धुरंधर

छपरा के धुरंधर


ऐसी चढ़ी जवानी सखी,
की हाहाकार मचा दूंगी।
पतली कमर के लचक पे अपनी
सखी, चीत्कार मचा दूंगी।
तरस रहे हैं,
आरा – बलिया के बाबूसाहेब
मैं तो छपरा के धुरंधर
संग खाट बिछा लूंगीं।
मैं तो छपरा के धुरंधर संग
विवाह रचा लूंगीं।

आह उठने लगी है
मेरी गदराई जवानी पे.
खेत और खलिहान सब सखी,
अपनी चोली से सुलगा दूंगी।
तरप रहे हैं,
गोरखपुर – धनबाद के बाबूसाहेब
मैं तो छपरा के धुरंधर से
चोली सिला लूंगीं।
मैं तो छपरा के धुरंधर संग
विवाह रचा लूंगीं।

परमीत सिंह धुरंधर

छपरा


वीरो की धरती है छपरा,
बलिदानों की गाथा है छपरा।
जब – जब सूरज को बादलों ने ढका है,
तो आँधियों की दास्ताँ हैं छपरा।
गंगा – घाघरा के पावन तट,
पे बसा है चित्रगुप्त -बिखारी ठाकुर का छपरा।
राजेन्द्र बाबु, लोकनायक, महामाया प्रसाद
भारत का पूरा इतिहास है छपरा।

 

परमीत सिंह धुरंधर

छपरा


वो भगवा ही क्या जिसमे रंग न छपरा से हो,
वो मिट्टी ही क्या जिसपे कोई वीर न छपरा से हो.
वो हुस्न ही क्या जिसका कोई आशिक न छपरा से हो,
वो वीर ही क्या जिसने जीता दिल न छपरा से हो.
वो राजनीति ही क्या जिसकी धुरी न छपरा से हो,
वो सत्ता ही क्या जिसपे बैठा न कोई छपरा से हो.

 

परमीत सिंह धुरंधर

मथुरा-छपरा


सैया के बाहों में बा ऐसा नशा,
की लूट गयील मथुरा,
पर आइल मजा.
जब दोनों तरफ से तीर चले लागल,
तो धधक गईल छपरा,
पर आइल मजा.

परमीत सिंह धुरंधर