ए पिता तुम हो कहाँ?-2


ए पिता तुम हो कहाँ, इस गगन के तले?
घिर चुका हूँ मैं चारो और से यहाँ बिन तेरे।
कोई राह नहीं, जो मंजिल तक चले
कोई सहारा नहीं, जिसको हम थाम लें.
किसको देखूं, किसको पुकारूँ यहाँ?
सभी मग्न हैं यहाँ हार पे मेरे।
जो कल तक मौन थे अपने सर को झुकाये
वो भी मुझपे तीर चलाने हैं लगे.
गिर रहा हूँ पल-पल में, क्या सम्भालूं अब?
सारे जख्म अब गहरे होने हैं लगे.
ए पिता तुम हो कहाँ, इस गगन के तले?
रोंदने लगे हैं, शत्रु पाकर मुझे अकेले।
आखरी साँसें हैं, आखरी इंतज़ार
लगता हैं तुम अब आकर बचा लोगे मुझे।

Rifle Singh Dhurandhar

ए पिता तुम हो कहाँ?


ए पिता तुम हो कहाँ, इस गगन के तले?
घिर गया हूँ चारों ओर से, मैं यहाँ बिन तेरे।
काँटे जो फूल बनकर मिलते थे
अब फूल भी शूल बन कर चुभने हैं लगे.
तेरा लाडला है धूल में धूसरित पड़ा
कब तक महेश्वर, ध्यान में रहोगे आँखें मूंदे?
उल्लास, उत्साह, उन्माद वो मेरा
हर प्रयास मेरा, अब एक बोझ सा लगे।
अधर-सुकोमल, वक्ष-सुडोल,
मेनका का आलिंगन भी विष सा लगे.

Rifle Singh Dhurandhar

पिता


तब तक साँसों का मेरे संचार रहे
जब तक पिता संग तेरे मेरा संसार रहे.
बिन तेरे धरा पे जीवन ही क्या?
तेरे चरणों पे हर जीवन निसार रहे.

Rifle Singh Dhurandhar

श्री गणेश और मूषक


पिता और मैं, जैसे
सुबह की लालिमा
और चाँद की शीतलता
दोनों एक साथ
जिसका स्वागत करते
पक्षीगण कलरव गान से.

पिता और मैं
सुसुप्त अवस्था में
जैसे कोई ज्वालामुखी
और बहुत अंदर उसके सीने में
कहीं आग सा धड़कता मैं.

पिता और मैं, जैसे
छपरा का कोई धुरंधर
त्यागकर अपनी चतुराई
और चतुरंगी सेना
बना मेरा सारथि
और कुरुक्षेत्र में उतरता
नायक बन कर मैं.

पिता और मैं, जैसे
शिव और भुजंग
पिता और मैं, जैसे
हरी और सुदर्शन
पिता और मैं, जैसे
सूर्य और अम्बर
पिता और मैं, जैसे
श्री गणेश और मूषक।

परमीत सिंह धुरंधर

प्रेम हो तो पिता सा – 2


प्रेम हो तो पिता सा
गोर मुख पे काले तिल सा.
हम सोंचे ये रूप है मेरा
ये यौवन है मेरा
मगर जमाना जानता है
की ये कमाल है इस तिल का.

हवाओं ने रुख बदले
सितारों ने चाल बदले
यौवन के ज्वार में रिश्ते
और रिश्तेदार बदले
मगर वो अटल है अम्बर पे ध्रुव सा.

परमीत सिंह धुरंधर

मोहब्बत का समंदर


मेरी मोहब्बत का समंदर
बस पिता के नाम से आरम्भ
और पिता के नाम पे
जिसका अंत होता है.
जैसे सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में
अनंत तक शिव, शिव
और बस शिव का नाम होता है.

परमीत सिंह धुरंधर

हैं पिता ही मेरे खुदा यहाँ


डूबता हैं किनारें वही,
जो नदियों के सहारे हैं.
है समुन्दर यहाँ अपना,
और हम समुन्दर के किनारें हैं.

चुभते हैं काँटे उनको,
जिन्हे फूलों की तमन्ना।
है शीशम यहाँ अपना,
और हम उसकी शाखाएँ हैं.

गर्व किसी का भी हो टूटता है,
खुदा से कितना भी दुआ कर लो.
हैं पिता ही मेरे खुदा यहाँ,
और हम उनके तराने हैं.

 

परमीत सिंह धुरंधर

पुत्र


पुत्र वही जो पिता के अपने चरणों में अभिमान करे,
चाहे शिव ही साक्षात् समक्ष हो,
वो पिता का ही गुणगान करे.

कुछ मोल नहीं इस जग में,
चाहे अमृतवा का ही पान हो,
वीर वही जो पिता के पाने शत्रुओं का संहार करे.

 

परमीत सिंह धुरंधर

मेरी माँ से मधुर, जग में कुछ भी नहीं


mom

मेरी माँ से मधुर, जग में कुछ भी नहीं।
मेरे पिता से चतुर, जग में कोई नहीं।
उनकी संतान मैं, मुझ सा प्रबल,
विकट – विरल, इस धरा पे कोई नहीं।

मेरी माँ से निर्मल, कोई गंगा नहीं,
मेरे पिता से प्रखर कोई सूर्य नहीं।
उनकी संतान मैं, मुझ सा अहंकारी,
अभिमानी, उन्मादी, उस सृस्टि में कोई नहीं।

मेरी माँ से सुन्दर, इस ब्रह्माण्ड में कोई नहीं।
मेरे पिता से तेजस्वी, इस त्रिलोक में कोई नहीं।
उनकी संतान मैं, मुझ सा धुरंधर,
भयंकर, और विशाल समुन्दर, कोई नहीं।

 

परमीत सिंह धुरंधर

मेरे पिता हैं शालिग्राम


अगर जीवन है एक संग्राम,
तो मेरे पिता हैं शालिग्राम।
जाने वो कौन सा एक पुण्य था,
जो मुझको मिला ये धाम.
कोई त्रिस्कार, कोई पुरस्कार,
अब मायने नहीं रखता।
इस रक्त से प्रवाहित मस्तक पे,
अब कोई और ताज नहीं शोभता।
अगर साँसों का होना है,
ब्रह्म के होने का प्रत्यक्ष प्रमाण,
तो मेरे पिता हैं उन वेदों का समस्त ज्ञान।

 

परमीत सिंह धुरंधर