लिखती थीं जो अपनी आँखों से,
मधुर निवेदन,
कि जहाँ कोई न खड़ा हो, वहाँ
मिलने का निमंत्रण.
चलती थीं सखियों संग,
बोझिल कदमो को आगे बढ़ाते,
मगर नज़रें खोजती थीं,
मुझे उनके पीछे आते.
किताबों में छुपा कर,
जो करती थीं,
दिलों का आदान – प्रदान,
आखरी रोटी को बचाकर,
खिलाती थीं जो,
लगाकर शहद सी मुस्कान.
जवानी की दहलीज पर,
वो गंगा की पहली मौज थीं,
मेरी कक्षा बारह की,
न्यूटन के तीसरे नियम की खोज थीं, परमित…..Crassa
भावनाओं का सुमधुर चित्रण! पढ़कर मन सचमुच मुग्ध हो गया!
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Thanks a lot, Bala jee……
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