माँ की ममता और पिता का दुलार


माँ की ममता और पिता का दुलार,
संसार में बस ये ही दो हैं भगवान्।
फिर भी मन भटकता है, कितनो के द्वार
बस पाने को जीवन में प्यार।

माँ की ममता और पिता का दुलार,
संसार में बस ये ही दो हैं भगवान्।
ये ही मेरे शिव हैं, ये ही मेरे विष्णु
इनकी चरणों में हैं चरों मेरे धाम.

माँ की ममता और पिता का दुलार,
संसार में बस ये ही दो हैं भगवान्।
और किसने लुटाये हंस-हंस के अपने स्वप्न
और कर दी तुमपे अपनी खुशियाँ निसार।adher

RSD

फटी-मैली-कुचैली साड़ी में


जो सर्वविदित सत्य है
उसी से सबको इंकार है.
जिसका प्रेम जितना पवित्र है
वो उतना ही लाचार है.
अश्कों में बंधकर भी
जिसका ह्रदय बिशाल है.
फटी-मैली-कुचैली साड़ी में
भी माँ सागर सी अथाह है.

जितना मथ लो, गरल की एक बून्द नहीं
बस प्रेम-ही-प्रेम, आपार है.
मगर मनुष्य को कहाँ
इसका ज्ञान है?
भागता-भागता ही रहा जो
चैन-सुकून की तालाश में
फिर लौटा है, महलों को छोड़कर
टूटी-फूटी-टपकती झोपडी में
जो उसके माँ का निवास है.

Rifle Singh Dhurandhar

छापरहिया एक बादल


मेरे मुख का दर्प ये ही हैं
ये ही हैं मेरे सागर।
पाकार इनसे जीवन-अमृत
हुआ मैं दम्भ में पागल।

अट्टहास लगाता जीवन में हूँ
की कोई छीन नहीं सकता मेरे ये आनंद।
सुशीला- धुरंधर का लाल मैं
फीका जिसके आगे स्वर्ग, मेनका का आंचल।

उसपे मैं तोमर राजपूत
और छापरहिया एक बादल।
जहां पे मैं ठहर जाऊं
वहीँ पे बरसे सावन।

The poem is written for my father and mother. It is the best blessing I have in my life.

Parmit Singh Dhurandhar

जाग अ – जाग अ हो शिकारी जाग अ


जाग अ – जाग अ हो शिकारी जाग अ
जाग अ – जाग अ हो शिकारी जाग अ.
तन – मन के आलस त्याग अ
जाग अ – जाग अ हो शिकारी जाग अ.

प्रभाकर चढ़ के आ गइलन अम्बर पे
तू हू अब अपना रथ के उतार अ.
जाग अ – जाग अ हो शिकारी जाग अ
जाग अ – जाग अ हो शिकारी जाग अ.

मन के बांधल जाला, तन के ना बांधे पौरष
निंद्रा-देवी से कह द, आपन बोरिया – बिस्तर बाँधस।
जाग अ – जाग अ हो शिकारी जाग अ
जाग अ – जाग अ हो शिकारी जाग अ.

कलरव-गान करके खगचर भरे उड़ान
तहरा देह के इ कइसन लागल थकान।
छू ने को आसमान तू भी हुंकार भर अ
जाग अ – जाग अ हो शिकारी जाग अ.

परमीत सिंह धुरंधर

जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय क्या है?


हमसे बोलो
तुम्हे क्या चाहिए?
तुम पुत्र मेरे हो
तुम्हे ला के हम देंगें।
जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय क्या है?
पुत्र तुम्हारे लिए
काल से भी हम टकरायेंगे।

पाकर तुम्हे प्रफुलित मन है
विराट होने का यही क्षण है
नस – नस में तुम्हारे
लहू है मेरा
नस – नस को तुम्हारे तृप्त करेंगे।
जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय क्या है?
पुत्र तुम्हारे लिए
काल से भी हम टकरायेंगे।

अधूरा है आनंद का हर एक पल
जो मुस्कान न हो तुम्हारे मुख पे
चल कर खुद काँटों पे
पुत्र तुम्हारे लिए
हम हर पुष्प खिलायेंगे।
जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय क्या है?
पुत्र तुम्हारे लिए
काल से भी हम टकरायेंगे।

धुरंधर – सुशीला के
लाल हो तुम
तुम्हें यूँ तो व्याकुल
नहीं देख पायेंगे।
जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय क्या है?
पुत्र तुम्हारे लिए
काल से भी हम टकरायेंगे।

भीषण होगा युद्ध
और वृद्ध हम होंगे
तब भी समर में
पुत्र तुम्हे
अकेला तो नहीं भेजेंगे।
जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय क्या है?
पुत्र तुम्हारे लिए
काल से भी हम टकरायेंगे।

प्रिये हो तुम पुत्र, अति हमें
ये प्यार किसी और को
तो हम फिर ना दे पायेंगे।
जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय क्या है?
पुत्र तुम्हारे लिए
काल से भी हम टकरायेंगे।

In the memory of my father Dhurandhar Singh.

परमीत सिंह धुरंधर

दबा देना तुम पाँव माँ का


आवो,
तुमको प्यार करूँ
जीवन की इन बाधाओं में.
पहला पग मैं रखूंगा
काँटा आये जो राहों में.

तुम मुझको मोहन कहना
कहूंगा राधा तुमको मैं.
पहला पग मैं रखूंगा
काँटा आये जो राहों में.

थोड़ा दबा देना तुम
पाँव माँ का रातों में.
ख्याल रखूंगा जीवन भर
मैं बढ़कर अपनी साँसों से.

आवो,
तुमको प्यार करूँ
जीवन की इन बाधाओं में.
पहला पग मैं रखूंगा
काँटा आये जो राहों में.

परमीत सिंह धुरंधर

मेरे माँ की दुआओं का दौर है


सितारों से कह दो
ये रहनुमाओं का दौर है.
तन्हा हूँ मैं यहाँ
मगर ये मेरे इरादों का दौर है.

मिटना मेरे नसीब में तय है
मगर मिटने से पहले
ये मेरे हौसलों का दौर है.

मेरी बुलंदियों को किसी की
ताबीज नहीं चाहिए।
मेरे सर पे मेरी माँ का हाथ है.
जब तक खड़ा हूँ यहाँ
तो समझों की
मेरे माँ की दुआओं का दौर है.

परमीत सिंह धुरंधर

माँ औलादें पाल ही लेतीं है


माँ
औलादें पाल ही लेतीं हैं
चाहे परिस्तिथियाँ कैसे भी हो.
माँ चाहे बूढी हो
झुकी कमर हो
हड्डियों में बुढ़ापे का दर्द
और ठण्ड का असर हो
पर खिसक – खिसक कर
चूल्हे में आग डाल ही देती है.
माँ
औलादें पाल ही लेतीं है.

सुख से, दुःख से
हंस कर या रो कर
अपने – पराये सबसे लड़कर
माँ अकेले, जूझते हुए
वक्त के हर सितम को सहकर
अपने बच्चों को बड़ा कर ही देती है.
माँ
औलादें पाल ही लेतीं हैं.

जब सबकी आँखों में निंद्रा का यौवन हो
और नशों में आलस्य की मदिरा हो
सूरज भी जब ना निकल सके
उन गहन अंधेरो को चीरकर
थकान से टूटते जिस्म में
माँ स्फूर्ति भर ही लेती है.
माँ
औलादें पाल ही लेतीं हैं.

अपनी भूख दबाकर
अपनी अभिलाषाओं का दमन कर
मैली – कुचैली, फटी साड़ी में भी मुस्कराकर
चार दीवारों में बंध कर
सिमटी जिंदगी के बावजूद
हर पल उल्लास से भरकर
अपने बच्चों के लिए
रात – दिन, दोपहर
माँ रोटी सेंक ही देती है.
माँ
औलादें पाल ही लेतीं हैं.

 

परमीत सिंह धुरंधर

माँ


माँ एक शब्द नहीं,
संसार है.
माँ सिर्फ धन नहीं,
कल्पवृक्ष, धेनुगाय है.
माँ सागर सी गहरी नहीं,
बल्कि अनंत हैं.
माँ ब्रह्मा, विष्णु, महेश नहीं,
गंगा, सरस्वती भी है.
माँ सिर्फ साकार एक तन नहीं,
निराकार सम्पूर्ण ब्रह्म है.

 

परमीत सिंह धुरंधर

मेरी माँ से मधुर, जग में कुछ भी नहीं


mom

मेरी माँ से मधुर, जग में कुछ भी नहीं।
मेरे पिता से चतुर, जग में कोई नहीं।
उनकी संतान मैं, मुझ सा प्रबल,
विकट – विरल, इस धरा पे कोई नहीं।

मेरी माँ से निर्मल, कोई गंगा नहीं,
मेरे पिता से प्रखर कोई सूर्य नहीं।
उनकी संतान मैं, मुझ सा अहंकारी,
अभिमानी, उन्मादी, उस सृस्टि में कोई नहीं।

मेरी माँ से सुन्दर, इस ब्रह्माण्ड में कोई नहीं।
मेरे पिता से तेजस्वी, इस त्रिलोक में कोई नहीं।
उनकी संतान मैं, मुझ सा धुरंधर,
भयंकर, और विशाल समुन्दर, कोई नहीं।

 

परमीत सिंह धुरंधर