छापरहिया


हम छापरहिया
जैसे घूमे है पहिया
दुनिया घुमा दें.
गोरी तेरी पतली कमर क्या है?
हम तो उड़ती चिड़िया फंसा लें.

हम छापरहिया
जैसे चमके है बिजुरिया
दुनिया चमका दें.
गोरी तेरी पतली कमर क्या है?
हम तो उड़ती चिड़िया फंसा लें.

हमें काट सके ना नयन-कटार
हमें क्या बाँधे कोई बयार?
किस्मत के ऐसे धनी हम
की बंजर में फूल खिला दें.
गोरी तेरी पतली कमर क्या है?
हम तो उड़ती चिड़िया फंसा लें.

हम से भागे भूत-पिचास
हम लगा दें बर्फ में आग
ऐसे खिलाड़ी हैं हम
आँखों से दिल को चुरा लें.
गोरी तेरी पतली कमर क्या है?
हम तो उड़ती चिड़िया फंसा लें.

Rifle Singh Dhurandhar

छपरा का छबीला


दिल का अनाड़ी
शहर में खिलाडी
करता हूँ साइकल की सवारी
ऐसा मैं बिहारी
ना अटकी है, ना अटकेगी
कहीं भी, कभी भी अपनी गाड़ी।

छपरा का छबीला
पटना का बादशाह
मराठों संग सजाई थी सल्तनत अपनी
ऐसा मैं बिहारी
ना अटकी है, ना अटकेगी
कहीं भी, कभी भी अपनी गाड़ी।

उस्तादों को पटका
हुस्नवालों को रंगा
दोस्तों का हूँ यार जिगड़ी
ऐसा मैं बिहारी
ना अटकी है, ना अटकेगी
कहीं भी, कभी भी अपनी गाड़ी।

भीड़ में अकेला
अकेले में भीड़
दोस्तों ने कहा, “मानुस है भारी”
ऐसा मैं बिहारी
ना अटकी है, ना अटकेगी
कहीं भी, कभी भी अपनी गाड़ी।

Rifle Singh Dhurandhar

छपरहिया


हम छपरहिया
जैसे घूमे हैं पहिया
अरे, दुनिया घुमा दें.

अरे तीखें नैनों वाली
चोली की लाली
अरे हम चाहें तो
आँखों का सुरमा चुरा लें.

यूँ तो भोले -भाले
हैं हम सीधे -सादे
आ जाएँ खुद पे
तो बिजली गिरा दें.

Rifle Singh Dhurandhar

अपने बेगम की चोली का रंग लाल हूँ


बेलगाम, बेधड़क, बेदाग़, बेबाक हूँ
हर खेल का माहिर धुरंधर
छपरा का मस्तान हूँ
जी हाँ, मैं खुद में एक बिहार हूँ.

रंगों से बना नहीं
मगर हर एक रंग में शामिल हूँ
कुवारियों के आँखों का ख्वाब
विवाहितों के दिल की कसक
मैं अपने बेगम की चोली का रंग लाल हूँ।
जी हाँ, मैं खुद में एक बिहार हूँ.

नागार्जुन का विद्रोह
दिनकर की आवाज हूँ
बुद्ध, महावीर का तप – त्याग
गुरु गोविन्द सिंह जी और चाणक्य
का शंखनाद हूँ.
जी हाँ, मैं खुद में एक बिहार हूँ.

पनघट पे गोरी की मुस्कान
मस्ती में बहता किसान हूँ
पुरबिया तान, खेत -खलिहान
फगुआ में भाभियों की सताता
निर्लज -बदमाश हूँ.
जी हाँ, मैं खुद में एक बिहार हूँ.

परमीत सिंह धुरंधर 

पिया निर्मोहिया


पिया निर्मोहिया ना समझे ला दिल के
कैसे समझाईं सखी अपना ई दिल के?
दिन भर बैठकी मारेला छपरा में
दहकत बा देहिया हमार सेजिया पे.

परमीत सिंह धुरंधर 

छपरा के जलेबी-2


अरे झूठे कहेला लोग इनके निर्मोही
पिया बारन धुरंधर इह खेल के.
बिना उठईले घूँघट हमार
अंग -अंग चुम लेहलन अपना बात से.

परमीत सिंह धुरंधर 

छपरा के जलेबी


पिया कहलन हमरा से रात में
छपरा घुमायेम तहरा के साथ में
खइया कचौड़ी गांधी चौक पे
और जलेबी, बैठ के हमरा हाथ से.

परमीत सिंह धुरंधर 

छपरा का धुरंधर


मेरे आसमा पे जितने भी सितारे हैं
सभी कह रहे की वो बिहारी हैं.
यूँ ही नहीं बना मैं छपरा का धुरंधर
मुझे बनाने वाले ये ही वो शिकारी हैं.

परमीत सिंह धुरंधर 

रिक्शे पे संग बैठ तो मेरी रानी


पतली कमर पे
आग लगा दूँ, हाहाकार मचा दू रानी।
काट ले जवानी, आके खलियानी।

झुमका दिला दूँ, नथुनी दिला दूँ
तू चल मलमलिया मेरी रानी।
काट ले जवानी, आके खलियानी।

छपरा दिखा दूँ, पटना घुमा दूँ
तू रिक्शे पे संग बैठ तो मेरी रानी।
काट ले जवानी, आके खलियानी।

परमीत सिंह धुरंधर 

छपरा का मल्लाह


धोबन इतना ना इठला
अपने जोबन पे.
बड़ी किस्मत से मिलता है
किसी को छपरा का मल्लाह।

मैं नहीं इठलाती
मेरी कमर ही लचक रही.
रखती हूँ जिसपे
छपरा के धुरंधर को बाँध के.

परमीत सिंह धुरंधर