गरीबी कट जाती है


बस्ती गैरों की
रोटी अपनों की
गरीबी कट जाती है
यूँ ही ढँक-ढाँक के.

थोड़ी बच्चो की मस्ती में
थोड़ी बड़ों की बेरुखी में
गरीबी कट जाती है
यूँ ही खेल-खाल के.

अमीरी कब किसी की भी सगी रही?
दौलत से कब समंदर की प्यास मिटी?
यूँ ही सट -साट के, रूठ -राठ के
गरीबी कट जाती है एक खाट पे.

परमीत सिंह धुरंधर

यह कुरुक्षेत्र है दोस्तों


दिल से लीजिये
दिल नहीं है तो
दिमाग से लीजिये
मगर फैसला तो लेना ही होगा।
यह कुरुक्षेत्र है दोस्तों
हौसला नहीं भी हो तो लड़ना ही होगा।
पलट तो सकते नहीं
मुख को मोड़ सकते नहीं
सोचने – समझने का अब कुछ नहीं
हाथ में अपने कुछ नहीं
कर्म का अब वक्त नहीं
सब निश्चित और सुनिश्चित है
उसको बदल पाना अब मुमकिन नहीं।
हसरतें, चाहतें सब छोड़कर
इरादों को बुलंद करना ही होगा।
यह कुरुक्षेत्र है दोस्तों
हौसला नहीं भी हो तो लड़ना ही होगा।
जो सम्मुख हैं
वो विमुख हैं
जो संग हैं खड़े
वो तो अप्रत्यक्ष हैं
अपने लक्ष्य के भेदन के लिए
अपने गांडीव पे तीरों का अव्वाहन करना ही होगा.
यह कुरुक्षेत्र है दोस्तों
हौसला नहीं भी हो तो लड़ना ही होगा।

परमीत सिंह धुरंधर

जिंदगी


जब गुजरता हूँ शहर के करीब से
तो बहुत याद आती हैं वो खाटों की लोरियाँ।

मैं तन्हा ही रह गया शहर में घुल के
इनसे अच्छी तो थी वो चुभती बालियाँ।

कौन कहता हैं की जिंदगी खुद की हाथों से संवरती हैं?
मैं भी जानने लगा हूँ कौन खींचता हैं ये डोरियाँ?

परमीत सिंह धुरंधर

जिंदगी का नशा


जिंदगी का नशा है जमीन से जुड़ने में
वरना आसमान तो पंखों को बस थकान देता है.
जितनी भी ऊँची हो उड़ान
आसमान पंक्षी को कहाँ विश्राम देता है?

परमीत सिंह धुरंधर

ये शहर है दोस्तों


दौलत की चमक किसे नहीं भाती?
ये शहर है दोस्तों, यहाँ रोशनी नहीं आती.
रिश्तों की राहें तो बहुत हैं यहाँ
मगर कोई राह दिल तक नहीं जाती।

परमीत सिंह धुरंधर


रूप और धुप दोनों पल – दो – पल के मेहमान हैं
ढलते हैं, तो बचता कोई नहीं इनका निशाँ हैं.

वृक्ष अगर साथ हो तो फिर धुप भी मीठी छावं हैं
वफ़ा में घुला रूप तो अमृत सामान है.

परमीत सिंह धुरंधर

जीवन-पथ पे भीष्म सा त्याग करो


जो मिले हैं, उनको प्यार करो
जो बिछुड़ गए, उन्हें याद करो
तुम मानव हो, बिना बिचलित हुए
इस जीवन-पथ पे, निरंतर प्रयास करो.

तुम देव नहीं, जो भोग मिलेगा
तुम पशु नहीं जो स्वछन्द विचरण करेगा
तुम मानव हो, बिना विचलित हुए
इस जीवन-पथ पे, निरंतर अभियान करो.

पथ में कुछ छाले मिलेंगें
पथ में कुछ कांटे भी मिलेंगे
सुन्दर अप्सराएं कभी,
दिखलायेंगी अपनी अदायें
तुम अपने ह्रदय से अब
माया-मिलन-मोह का त्याग करो.
तुम मानव हो, बिना विचलित हुए
इस जीवन-पथ पे, निरंतर हुंकार भरो.

क्या है नारी के देह में?
और क्या है उसके वक्षों पे?
कौन है सुन्दर वो नारी जो?
गृहणी बनकर संतुस्ट हुई
और कौन तृप्त हुई?
भला नगर-वधु बनकर।
तुम मानव हो, बिना विचलित हुए
इस जीवन-पथ पे, भीष्म सा त्याग करो.

परमीत सिंह धुरंधर