कब जहर सा काम कर दे


ना सम्भालों नजर को शर्म से आकर इस मुकाम
बहकने लगे हैं कदम तो फिर कैसा – कोई पड़ाव?
खेल लेने दो हमें इन जुल्फों से बस एक शाम
न जाने कब जहर सा काम कर दे, तुम्हारी मोहब्बत का ये जाम?

परमीत सिंह धुरंधर

अभियान


मदहोशियों की रात थी
जब तुम मेरे साथ थी
साँसों का बहाव था
घोंसलों में पड़ाव था.

पंखों को समेटे
आँखों को मूंदे
रक्त के तीव्र प्रवाह
में मिल रहे थे अंग – अंग
जाने कैसा वो अभियान था.

परमीत सिंह धुरंधर

थोड़ी – थोड़ी


किसको मैं प्यार करूँ?
ये दिल तू ही बता
वो हर रात थोड़ी – थोड़ी
मुझसे दूर जा रही हैं.

कोई और भी तो नहीं है
जो मेरी नशों में ऐसा रास घोले
वो तो अब इन नशों में
उतरने से इंकार कर रही हैं.

परमीत सिंह धुरंधर

बस दो बून्द ढलका दिया


मेरी उम्र गुजर गई जिस मयखाने में
वहीँ पे शहर ने अपना गुलशन बना लिया।

ता उम्र हम जिसके पिघलते रहे
उस हमनवाज ने मेरी मौत पे
बस दो बून्द ढलका दिया।

परमीत सिंह धुरंधर

मधुबन में तुमसे मिलन कैसा?


तेरी एक नजर पे उम्र ठहर गयी
बस जिंदगी ने साथ नहीं दिया।
गरल ही तरल हो तो सरल क्या?
मधुबन में तुमसे मिलन कैसा?

तपते रेगिस्तान में
तन को झुलसाती हवायें हैं
विचलित पथिक हो तो प्रयास क्या?
मधुबन में तुमसे मिलन कैसा?

जीवन अमृत की तलाश में आधर पे अमृत-कलश हो
छलक गरल जाए
यह जान मुख मोड़ लूँ तो प्यास क्या?
मधुबन में तुमसे मिलन कैसा?

परमीत सिंह धुरंधर

मैं शिव-शंकर सा भोला हूँ


प्रिये प्रेम मिलन में मैं तुमसे
प्रति दिन ही हारा हूँ
तुम छलती हो नैनों से
और मैं शिव-शंकर सा भोला हूँ.

तुम मृग बनकर कुलांचे भरती
मधुवन के सारे पथों पे
मैं मीरा सा तुम्हारे एक दरस को
जन्मों की प्यास संजों बैठा हूँ.

परमीत सिंह धुरंधर

जाग अ – जाग अ हो शिकारी जाग अ


जाग अ – जाग अ हो शिकारी जाग अ
जाग अ – जाग अ हो शिकारी जाग अ.
तन – मन के आलस त्याग अ
जाग अ – जाग अ हो शिकारी जाग अ.

प्रभाकर चढ़ के आ गइलन अम्बर पे
तू हू अब अपना रथ के उतार अ.
जाग अ – जाग अ हो शिकारी जाग अ
जाग अ – जाग अ हो शिकारी जाग अ.

मन के बांधल जाला, तन के ना बांधे पौरष
निंद्रा-देवी से कह द, आपन बोरिया – बिस्तर बाँधस।
जाग अ – जाग अ हो शिकारी जाग अ
जाग अ – जाग अ हो शिकारी जाग अ.

कलरव-गान करके खगचर भरे उड़ान
तहरा देह के इ कइसन लागल थकान।
छू ने को आसमान तू भी हुंकार भर अ
जाग अ – जाग अ हो शिकारी जाग अ.

परमीत सिंह धुरंधर