उम्र की बंदिशे


इश्क़ ने तन्हा कर दिया उम्र की बंदिशे लगाकर
उनकी पावों में पायजेब दे दिया मेरी नींदे उड़ाकर।

 

परमीत सिंह धुरंधर

मेरे माँ की दुआओं का दौर है


सितारों से कह दो
ये रहनुमाओं का दौर है.
तन्हा हूँ मैं यहाँ
मगर ये मेरे इरादों का दौर है.

मिटना मेरे नसीब में तय है
मगर मिटने से पहले
ये मेरे हौसलों का दौर है.

मेरी बुलंदियों को किसी की
ताबीज नहीं चाहिए।
मेरे सर पे मेरी माँ का हाथ है.
जब तक खड़ा हूँ यहाँ
तो समझों की
मेरे माँ की दुआओं का दौर है.

परमीत सिंह धुरंधर

गाँव छोड़ दी मैंने


इश्क़ करने चले थे
धर्म बीच में आ गया.
मंदिर छोड़ दी मैंने
उनसे मगर चर्च न छूटा।

उन्हें शक था
गाँव के जाहिल लोग
इस रिश्ते को स्वीकार नहीं करेंगें।
मगर अंत में उनके शहर के लोगों ने
बीच में दीवार चुनवा दिया।
गाँव छोड़ दी मैंने
मगर उनसे शहर न छूटा।

अंत भी इस कदर हुआ
इश्क़ का मेरे
की बेवफाई का हर ठीकरा
मेरे सर ही फूटा।

इश्क़ करने चले थे
धर्म बीच में आ गया.
मंदिर छोड़ दी मैंने
उनसे मगर चर्च न छूटा।

परमीत सिंह धुरंधर

हैं पिता ही मेरे खुदा यहाँ


डूबता हैं किनारें वही,
जो नदियों के सहारे हैं.
है समुन्दर यहाँ अपना,
और हम समुन्दर के किनारें हैं.

चुभते हैं काँटे उनको,
जिन्हे फूलों की तमन्ना।
है शीशम यहाँ अपना,
और हम उसकी शाखाएँ हैं.

गर्व किसी का भी हो टूटता है,
खुदा से कितना भी दुआ कर लो.
हैं पिता ही मेरे खुदा यहाँ,
और हम उनके तराने हैं.

 

परमीत सिंह धुरंधर

पुत्र


पुत्र वही जो पिता के अपने चरणों में अभिमान करे,
चाहे शिव ही साक्षात् समक्ष हो,
वो पिता का ही गुणगान करे.

कुछ मोल नहीं इस जग में,
चाहे अमृतवा का ही पान हो,
वीर वही जो पिता के पाने शत्रुओं का संहार करे.

 

परमीत सिंह धुरंधर

14 फरवरी (#ValentinesDay)


नवम्बर का महीना था,
दिसंबर का इंतज़ार था,
वो बोलीं,
जनवरी में मेरी हो जायेंगीं।

एक चिठ्ठी पहुँची,
फरवरी में घर मेरे,
की 14 को,
वो किसी और की हो जायेंगीं।

 

परमीत सिंह धुरंधर

गर्भ से ही निकला हूँ करके तैयारी


जो प्रेम करता है पिता से,
वो होता है विलक्षण – प्रलयंककारी।
श्री राम, परशुराम, मेघनाथ, भीष्म, कर्ण,
अब है अभिमन्युँ की बारी।

बस पिता ही पूज्य हैं इस जीवन में,
बस वो ही विराजमान हैं ह्रदय में.
स्वीकार है, हर जख्म – हर घाव,
पुरस्कार है मौत भी इस पथ पे.

कितने भी हो आप भयंकर योद्धा,
महारथी और चकर्वर्ती,
क्या बांधेंगे मुझे इस चक्रव्यूह में?
गर्भ से ही निकला हूँ करके इसी दिन की तैयारी।
जो प्रेम करता है पिता से,
वो होता है विलक्षण – प्रलयंककारी।

 

परमीत सिंह धुरंधर