हर स्तन शिशु का आहार नहीं होता


पाकर हुस्न को, इतराना छोड़ दो.
वफ़ा और हुस्न का, कभी साथ नहीं होता।
जितनी भी राते, चाहे साथ गुजार लो
ह्रदय में हुस्न के, कभी एक समय,
कोई एक नहीं होता।

वही मेनका, वो ही शकुंतला,
हर स्तन शिशु का आहार नहीं होता।
नस-नस में इनके मक्कारी है भरी,
इनके चेहरे से ये नकाब नहीं गिरता।
जब दिल टुटा मेरा तब मैंने जाना,
क्यों हुस्न पे किसी का एतबार नहीं होता?

 

परमीत सिंह धुरंधर

स्त्री


सत्य की पूजा नहीं होती,
धर्म की चर्चा नहीं होती।
वेदों को जरूरत नहीं,
जिन्दा रहने के लिए,
की मनुष्य उसे पढ़ें।
वेदों की उत्पत्ति,
मनुष्यों से नहीं होती।
तैमूर, चंगेज, क्या?
सिकंदर भी थक गया था,
यहाँ आके.
ये हिन्द है,
यहाँ तलवारो के बल पे,
तकदीरें सुशोभित नहीं होती।
वो जितना भी सज ले,
तन पे आभूषण लाद के.
मगर, यहाँ, बिना शिशु को,
स्तनपान कराये,
नारी कभी पूजित नहीं होती।
घमंड किसे नहीं,
यहाँ सृष्टि में.
बिना अहंकार के,
सृष्टि भी शाषित नहीं होती।
तीक्ष्ण बहुत है तीर मेरे,
मगर बिना तीक्ष्ण तीरों के,
शत्रु कभी पराजित नहीं होती।
मुझे संतोष है,
की वो वेवफा निकली।
क्यों की बिना बेवाफ़ाई के,
कोई स्त्री कभी परिभाषित नहीं होती।

 

परमीत सिंह धुरंधर

तो प्रतिकार करना होगा


ये कैसी जिंदगी है, जो दर्द से भरी हैं.
आँखों में काजल है, वो भी आंसू से भींगी हैं।
ओठों पे है लाली, कानो में है बाली,
खनकती है पायल, पर अपने ही आँगन में नौकर बनी है.
थामा था जिसने हाथ, लेके फेरे हाँ सात,
पर एक रात के बाद ही, उसके बिस्तर पे लाश सी पड़ी है.
जिसकी हाँ कमर पे, कितने मर मिटे,
जिसकी एक झलक पे, कितने दीवाने थे मचले,
आज उसी के अंगों पे, खून की नदी है.
तो प्रतिकार करना होगा, ऐसे इंसानो का,
जिनकी नजर में, औरत सिर्फ एक बेबसी है.

 

परमीत सिंह धुरंधर

नारी सम्मान या एक ढोंग


रामायण, महाभारत और भारतीय घरों में कलह और बटवारे का दोष सदा से भारतीय नारियों के माथे मढ़ा गया है. लेकिन, आज तक किसी ने भी देश के बटवारे का दोषी ढूढ़ने का प्रयास नहीं किया, क्यों की इसके जिम्मेवार हमारे पुरुष भाइयों की सत्ता की भूख और उनकी सोच थी. नारी सम्मान की चिंता करने और उसके लिए चिल्लाने वालो ने कभी इस तरफ धयान नहीं दिया।

परमीत सिंह धुरंधर

अंतर


औरत कितना भी शोर मचा ले,
कोई नहीं सुनता.
लेकिन, जब माँ को गुस्सा आता है तो,
कैसा भी बाप हो वो शांत हो जाता है.

परमीत सिंह धुरंधर

Women’s Day


There is no use in celebrating “Women’s Day” until and unless:
Kareena Kappor understands the pain of Amrita Singh,
Hema Malini understands the pain of Prakash Kaur,
Rekha understands the pain of Jaya Bhaduri,
Soniya Gandhi understands the pain of Menka Gandhi,
Sridevi understands the pain of Mona Kapoor,
Kiran Rao understands the pain of Reena Dutt,
Lara Dutta understands the pain of Shveta Jaishankar,
Sarika understands the pain of Vani Ganapathy,
Gouthami Tadimalla understands the pain of Sarika,
and ……
Until and unless an Indian woman understands the pain of another woman, just tagging a photo or writing about “Women’s Day” and women power is meaningless.

Parmit Singh Dhurandhar