खुशबु मेरी मिटटी की


मगरूर जमाना क्या समझे खुशबु मेरी मिटटी की?
जहाँ धूल में फूल खिलते हैं बस पाके दो बूंदें पानी की.

मगरूर जमाना क्या समझे खुशबु मेरी मिटटी की?
एक बूढ़े ने बदल दी थी सनकी सियासत दिल्ली की.

परमीत सिंह धुरंधर

भोजपुरी भाषा की प्रचुरता का प्रमाण:1


दुनिया में सबसे ज्यादा पर्यायवाची शब्द पति के लिए भोजपुरी भाषा में ही है. जैसे बिहार की महिलायें अपने पति को निम्न शब्दों से सम्भोधित करती हैं. इसका एक प्रमुख कारण है की वो पति का नाम नहीं लेती हैं.
करेजा, राजा, रजऊ, करेजऊ, भतार, पति, परमेश्वर,भगवान्, भ्रह्मबाबा, बाबू, देवता, मुखिया, बाबूसाहेब, मास्टर साहेब, उनकर भइया, भलुआ के पापा, मुनिया के चाचा, छोटुआ के फूफा, बबुनी के जीजा, आँख के तारा, जलेबी, रसगुल्ला, प्राणनाथ, स्वामी, प्राणेश्वर, इत्यादि।

परमीत सिंह धुरंधर

छपरा का मल्लाह


धोबन इतना ना इठला
अपने जोबन पे.
बड़ी किस्मत से मिलता है
किसी को छपरा का मल्लाह।

मैं नहीं इठलाती
मेरी कमर ही लचक रही.
रखती हूँ जिसपे
छपरा के धुरंधर को बाँध के.

परमीत सिंह धुरंधर

छपरा की मिट्टी


जो तन्हा है
वो Crassa तो नहीं है.

जिसे प्यार मिल गया
उसे वक्त ने तरासा तो नहीं है.

दो-बूंदों में लहलहा जाए जो फसल
उसमे किसान का पसीना तो नहीं है.

जिन्हे अपने इतिहास का ज्ञान नहीं
उन राजपूतों की कोई गाथा तो नहीं है.

हर शहर की किस्मत में मेरा साथ नहीं
ऐसा शहर भी नहीं, जहाँ मेरी चर्चा नहीं है.

छपरा की मिट्टी पे जो भी फूल खिला
उसे हवाओं ने बांधा तो नहीं है.

परमीत सिंह धुरंधर

ताज छपरा का


वो मुस्कराती रहीं
मैं उन्हें हसाता रहा.
उनके नैनों से नैंना
मिलाता रहा.
वो बेवफा थी मगर
मैं भी बिहारी था.
उनको उनकी ही
नाच में नचाता रहा.

वो इठलाती थी
सखियों के बीच में.
कहती थी की
घुमा रही हैं मुझे।
वो बेवफा थी मगर
मैं भी बिहारी था.
उनके पीछे -पीछे
जाता रहा.

जब – जब सत्ता का उन्हें
चढ़ा गरूर।
विद्रोह का झंडा
उठता रहा.
यूँ ही नहीं है सर पे
ताज छपरा का.
अरे बुढ़ापे में भी
विगुल मैं वजाता रहा.

परमीत सिंह धुरंधर

छपरा के धुरंधर


ऐसी चढ़ी जवानी सखी,
की हाहाकार मचा दूंगी।
पतली कमर के लचक पे अपनी
सखी, चीत्कार मचा दूंगी।
तरस रहे हैं,
आरा – बलिया के बाबूसाहेब
मैं तो छपरा के धुरंधर
संग खाट बिछा लूंगीं।
मैं तो छपरा के धुरंधर संग
विवाह रचा लूंगीं।

आह उठने लगी है
मेरी गदराई जवानी पे.
खेत और खलिहान सब सखी,
अपनी चोली से सुलगा दूंगी।
तरप रहे हैं,
गोरखपुर – धनबाद के बाबूसाहेब
मैं तो छपरा के धुरंधर से
चोली सिला लूंगीं।
मैं तो छपरा के धुरंधर संग
विवाह रचा लूंगीं।

परमीत सिंह धुरंधर

बिहारी कौवा इश्क़ में


कौवा बोलै इश्क़ में
तुझे प्यार करूँगा लेके risk मैं.

काला हूँ पर हूँ बिहारी मैं
गोता लगाता हूँ बड़ा तीव्र मैं.

परमीत सिंह धुरंधर