मरदा बोले मोदी, माउगि वो बोले मोदी


अरे मरदा बोले मोदी, माउगि वो बोले मोदी
सुन हो भैया, फेनु मोदी के सरकार ही नु बनी।
बुढ़वो चुने मोदी, जवनका भी चुने मोदी
सुन हो भैया, पूरा बिहार मोदी के ही त चुनी।

घूँघट में भी मोदी, मूँछवा पे भी मोदी
सुन हो भैया, बिहार में कमल ही खिली।
ना मिलिअन पप्पू, ना दिखिअन फिर पप्पू
सुन हो भैया, बिहार में कमल ही खिली।

Rifle Singh Dhurandhar

छपरहिया


हम छपरहिया
जैसे घूमे हैं पहिया
अरे, दुनिया घुमा दें.

अरे तीखें नैनों वाली
चोली की लाली
अरे हम चाहें तो
आँखों का सुरमा चुरा लें.

यूँ तो भोले -भाले
हैं हम सीधे -सादे
आ जाएँ खुद पे
तो बिजली गिरा दें.

Rifle Singh Dhurandhar

सुशांत सिंह राजपूत की जंग जारी रखेंगें


मैं तो मुंबई से पहले ही परास्त हुआ
तुम तो मुंबई तक पहुँच गए.
मैं अपने पहली ही जंग में हार गया
तुम तो कितने जंग फतह कर गए.
यह लड़ाई न मेरी है, ना यह जंग तुम्हारी थी
ये जंग हमारी है, हाँ ये जंग हम सबकी है.
यह जंग है,
हमारे सपनों की उनके गुनाहों से
हमारे अधिकारों की उनकी सत्ता से
हम छोटे शहर की चींटियों की
इन जंगल के हांथियों से.
चाणक्य की
धनानंद के उन्माद और अहंकार से.

आज भले हम हार गए
आज भले दूर -दूर तक
हमारे सितारे धूमिल हैं.
मगर हम शिवाजी के छोटे झुण्ड में आते रहेंगें
और लुटते रहेंगे इनके महलों को
इनकी खुशियों को, तब तक
जब तक औरंगजेब की इस सत्ता
को नष्ट ना कर दे,
तबाह ना कर दे.

हम चीटिंयां हैं चाणक्या के
हम चिड़ियाँ हैं गुरु गोबिंद सिंह जी के
हम कटेंगे, हम गिरेंगे, पर लड़ेंगें तब तक
जब तक विजय श्री हमारी नहीं।
आज चाहे जितना उत्सव माना लो मेरे अंत का
कल तुम्हारा जयदर्थ सा अंत करेंगे।

परमीत सिंह धुरंधर 

अपने बेगम की चोली का रंग लाल हूँ


बेलगाम, बेधड़क, बेदाग़, बेबाक हूँ
हर खेल का माहिर धुरंधर
छपरा का मस्तान हूँ
जी हाँ, मैं खुद में एक बिहार हूँ.

रंगों से बना नहीं
मगर हर एक रंग में शामिल हूँ
कुवारियों के आँखों का ख्वाब
विवाहितों के दिल की कसक
मैं अपने बेगम की चोली का रंग लाल हूँ।
जी हाँ, मैं खुद में एक बिहार हूँ.

नागार्जुन का विद्रोह
दिनकर की आवाज हूँ
बुद्ध, महावीर का तप – त्याग
गुरु गोविन्द सिंह जी और चाणक्य
का शंखनाद हूँ.
जी हाँ, मैं खुद में एक बिहार हूँ.

पनघट पे गोरी की मुस्कान
मस्ती में बहता किसान हूँ
पुरबिया तान, खेत -खलिहान
फगुआ में भाभियों की सताता
निर्लज -बदमाश हूँ.
जी हाँ, मैं खुद में एक बिहार हूँ.

परमीत सिंह धुरंधर 

छपरा के जलेबी-2


अरे झूठे कहेला लोग इनके निर्मोही
पिया बारन धुरंधर इह खेल के.
बिना उठईले घूँघट हमार
अंग -अंग चुम लेहलन अपना बात से.

परमीत सिंह धुरंधर 

छपरा का धुरंधर


मेरे आसमा पे जितने भी सितारे हैं
सभी कह रहे की वो बिहारी हैं.
यूँ ही नहीं बना मैं छपरा का धुरंधर
मुझे बनाने वाले ये ही वो शिकारी हैं.

परमीत सिंह धुरंधर 

मासिक -माहवारी


हम ही खगचर, हम ही नभचर
हमसे ही धरती और गगन
हम है भारत की संतान, मगर
भारत को ही नहीं है खबर हमारी।
पल -पल में प्रलय को रोका है, और
पल- पल ही है प्रलय सा हमपे भारी।

बाँध – बाँध के तन को अपने
काट – काट के पत्थर – पाषाण को
सौंदर्य दिया है जिस रूप को
उसके ही आँगन से निकाले गए,
जैसे मासिक -माहवारी।
पल -पल में प्रलय को रोका है, और
पल- पल ही है प्रलय सा हमपे भारी।

समझा जिनको बंधू – सखा
उन्होंने ना सिर्फ मुख मोड़ा
हथिया गए धीरे – धीरे, मेरी किस्मत,
तिजोरी, और रोटी।
पल -पल में प्रलय को रोका है, और
पल- पल ही है प्रलय सा हमपे भारी।

सत्ता भी मौन खड़ी है, भीष्म – द्रोण, कर्ण सा
निर्वस्त्र करने को हमारी पत्नी, बहू और बेटी
रह गया है बाकी
अब केवल कुरुक्षेत्र की तैयारी।
पल -पल में प्रलय को रोका है, और
पल- पल ही है प्रलय सा हमपे भारी।

परमीत सिंह धुरंधर 

मेरा इश्क़ जवान है


मुझे नहीं पता मेरे ईमान का रंग क्या है
पर मेरी आन, बाण और शान बिहार है.
उन्हें हुश्न का चाहे जितना गुमान हो
पर इस उम्र में भी मेरा इश्क़ जवान है.

परमीत सिंह धुरंधर 

जोगीरा सारा रारा -2


ई रहली ई -घाट, ऊ रहली उ -घाट
दुनो के छेद दिहनि एके तीर में, अइसन हम तीरंदाज।
जोगीरा सारा रारा, जोगीरा सारा रारा।

खाजा खिलाइनि, खजुली खिलाइनि, खिलाइनि सारा मिष्ठान,
जब तक कटहल ना खइली, ना भइली ु शांत।
जोगीरा सारा रारा, जोगीरा सारा रारा।

सालभर भौजी रहेली बीमार
आइल फागुन, चोली कास के होगइली तैयार।
जोगीरा सारा रारा, जोगीरा सारा रारा।

आरा के लोग, बलिया के लोग, अरे छपरा के लोग
देख ताहार जवानी, सबके लागल बा इश्क़ के रोग.
जोगीरा सारा रारा, जोगीरा सारा रारा।

माई-बाप दुनू रखत नइखे लोग बेटा के नाम
की पंडित जी बतईले बारन नाम, अरविन्द केजरीवाल।
जोगीरा सारा रारा, जोगीरा सारा रारा।

परमीत सिंह धुरंधर