भतार सिंह, लताड़ सिंह, नवजात सिंह और खलिहान सिंह


भोजपुरी भाषा की प्रबलता का प्रमाण ये है की इसमें आप किसी का
नाम भतार सिंह, लताड़ सिंह, नवजात सिंह और खलिहान सिंह रख सकते हैं.

परमीत सिंह धुरंधर

बिहारी


मन का बिहारी
तन का बिहारी
हारा है कब, बताओ?
जब तक है लाठी हाथों में
किसने पछाड़ा, बताओ?

हम जो उगा दे वो बंजर पे फूल
हम मिटा दे चाहे पत्थर या शूल
भोलेनाथ के सिवा
कहीं सर झुकाया तो बताओ।
मारिसस भी जाके
छपरा को भुलाया तो बताओ।

वो ले गए सोना
वो ले गए चांदी
काले पीतल को
सोना न बनाया तो बताओ।
उलझनों से कभी मुख चुराया
तो बताओ।

परमीत सिंह धुरंधर

तुमसे आगे कौन?


तुम्ही वशिष्ठ, तुम्ही नारायण
तुमसे आगे कौन?
वृहस्पति का आशीष तुम्हे
फिर तुमसे आगे कौन?
धरा भी विचलित हो जाती थी
जब अँगुलियों में कलम खेलती थी
अब जाने गलत हो जाए प्रमेय कौन?

बाल – क्रीड़ा में, साइंस -कॉलेज में
एक से एक उदण्ड
उनमे तुम प्रखर ऐसे
जैसे अम्बर पे मार्तण्ड।
तुमसे मिल कर केली भी ऐसे
विस्मित -वशीभूत
की ज्ञान के इस सागर का
मोल लगाए कौन?
ऐसे ही लाल से, माँ होती है धन्य
अब कहाँ, किसपे ममता लुटाये कौन?

My tribute to the great mathematician of Bihar late Vashishtha Narayan Singh.

परमीत सिंह धुरंधर

खुशबु मेरी मिटटी की


मगरूर जमाना क्या समझे खुशबु मेरी मिटटी की?
जहाँ धूल में फूल खिलते हैं बस पाके दो बूंदें पानी की.

मगरूर जमाना क्या समझे खुशबु मेरी मिटटी की?
एक बूढ़े ने बदल दी थी सनकी सियासत दिल्ली की.

परमीत सिंह धुरंधर

भोजपुरी भाषा की प्रचुरता का प्रमाण:1


दुनिया में सबसे ज्यादा पर्यायवाची शब्द पति के लिए भोजपुरी भाषा में ही है. जैसे बिहार की महिलायें अपने पति को निम्न शब्दों से सम्भोधित करती हैं. इसका एक प्रमुख कारण है की वो पति का नाम नहीं लेती हैं.
करेजा, राजा, रजऊ, करेजऊ, भतार, पति, परमेश्वर,भगवान्, भ्रह्मबाबा, बाबू, देवता, मुखिया, बाबूसाहेब, मास्टर साहेब, उनकर भइया, भलुआ के पापा, मुनिया के चाचा, छोटुआ के फूफा, बबुनी के जीजा, आँख के तारा, जलेबी, रसगुल्ला, प्राणनाथ, स्वामी, प्राणेश्वर, इत्यादि।

परमीत सिंह धुरंधर

छपरा का मल्लाह


धोबन इतना ना इठला
अपने जोबन पे.
बड़ी किस्मत से मिलता है
किसी को छपरा का मल्लाह।

मैं नहीं इठलाती
मेरी कमर ही लचक रही.
रखती हूँ जिसपे
छपरा के धुरंधर को बाँध के.

परमीत सिंह धुरंधर

छपरा की मिट्टी


जो तन्हा है
वो Crassa तो नहीं है.

जिसे प्यार मिल गया
उसे वक्त ने तरासा तो नहीं है.

दो-बूंदों में लहलहा जाए जो फसल
उसमे किसान का पसीना तो नहीं है.

जिन्हे अपने इतिहास का ज्ञान नहीं
उन राजपूतों की कोई गाथा तो नहीं है.

हर शहर की किस्मत में मेरा साथ नहीं
ऐसा शहर भी नहीं, जहाँ मेरी चर्चा नहीं है.

छपरा की मिट्टी पे जो भी फूल खिला
उसे हवाओं ने बांधा तो नहीं है.

परमीत सिंह धुरंधर