काफिर पढ़ने लगें आयतें


तू आँखों से पीला दे
तो जवानी लगे झूमने।
तू घूँघट जो उठा दे
तो काफिर पढ़ने लगें आयतें।
तेरे ही इशारों पे
चल रहें हैं चाँद और तारें।
तेरी एक ही नजर
कलियों को खिला दे.
गूंज रहें भौरें
तेरा ही तराना।
तू बाहों में सुला ले
तो छोड़ दें जमाने की हसरतें।

परमीत सिंह धुरंधर

You flow like a river


You flow like a river
Full of treasures
But you are not in my life
It feels like a looser.
So tell me, tell me, tell me
When will we be together?
To count stars in the sky
To give us another try.

You reflect like pure water
Fresh, sweet and milky color
But you are not in my life
So tell me, tell me, tell me
When will we be together?
To swim and catch fish
To rinse and erase past.

Parmit Singh Dhurandhar

नादाँ हैं भौरें


बड़े नादाँ हैं भौरें
परेशान है भौरें
जाने क्या ढूंढते हैं
जाने कैसा आसमान, भौरें?
इनको पता नहीं है
कलियाँ कितनी चालाक हैं।
ठग लेती हैं सबको
बस खर्चती एक मुस्कान हैं.

बड़े ब्याकुल हैं भौरें
बड़े बेताब हैं भौरें
किसी बनाने को
इनको पता ही नहीं
कलियाँ कितनी चालाक हैं
मासूम बनती हैं
पर दिल की बड़ी बईमान हैं.

परमीत सिंह धुरंधर

हवायें ये मेरे हिन्द की


दिल बेख़ौफ़ है सजाए – मौत से
कोई जालिम से कह दे
की अब खंजर उतारे.
बेधड़क धड़क रहीं हैं धड़कने मेरी
कोई जालिम से कह दे
की वो अपना जोर और बढ़ाये.

आजाद रहीं हैं
आजाद ही रहेंगी ये वादियाँ।
चंचल हैं बड़ी, हवायें ये मेरे हिन्द की
कोई जालिम से कह दे
की इन्हें अब बेड़िया पहनाये।

Dedicated to Ram Prasad Bismil.

परमीत सिंह धुरंधर

When will it be again?


With such a sharp jawline
And a perfect smile
You are touching the base of my heart
Thorough your eyes.
I don’t know
When will it be again?

I want to hold
To make you much close
To feel your heart
Through your eyes
At least once again in my life
Because I don’t know
When will it be again?

The circular walk
Was never so much beautiful
And I don’t know
When will it be again?

I never realized
Throughout the whole night
You are a m of 3
As you look like just sixteen
I want it again
But don’t know
Will it be again?

Parmit Singh Dhurandhar

ठहाके लगने लगते हैं


जहाँ भी बैठ जाए
ठहाके लगने लगते हैं.
दौर कोई भी हो
आसमा पे इंद्रधनुष खिलने लगते हैं.
दुश्मन की उड़ जाती हैं नींदे
उनके इतिहास के किस्से खलने लगते हैं.

परमीत सिंह धुरंधर

इस कदर तेरा ख्वाब है


सब पूछते हैं यहाँ की
क्यों मेरे हाथों में हर पल शराब हैं?
बिखर गयी है जिंदगी
इस कदर मुझे तेरा ख्वाब है.
तुझे क्या मिल गया?
इस दौलत से सजे सेज पे.
मेरी तो दुनिया बस
ग़मगीन और वीरान है.

Dedicated to Shiv Kumar Batalvi.

परमीत सिंह धुरंधर