घूँघट का दौर


कब तक बहलाओगी किताबों से खुद को?
वो बचपन का दौर था, ये जवानी का दौर है.

आँखों के शर्म को पलकों पे रहने दो
वो घूँघट का दौर था, ये निगाहों का दौर है.

परमीत सिंह धुरंधर

छपरा की मिट्टी


जो तन्हा है
वो Crassa तो नहीं है.

जिसे प्यार मिल गया
उसे वक्त ने तरासा तो नहीं है.

दो-बूंदों में लहलहा जाए जो फसल
उसमे किसान का पसीना तो नहीं है.

जिन्हे अपने इतिहास का ज्ञान नहीं
उन राजपूतों की कोई गाथा तो नहीं है.

हर शहर की किस्मत में मेरा साथ नहीं
ऐसा शहर भी नहीं, जहाँ मेरी चर्चा नहीं है.

छपरा की मिट्टी पे जो भी फूल खिला
उसे हवाओं ने बांधा तो नहीं है.

परमीत सिंह धुरंधर

किस्मत


वो मोहब्बत की बातें, वो शरारत की रातें
खुदा जानता है, हमें आज भी हो तुम याद.

गुनाहों में साथ थे, पनाहों में साथ थे
बस किस्मत में ही नहीं लिखा था साथ.

तुम जाने कैसे जीने लगे हमसे दूर होकर
हमें तो साँसें भी लगती हैं अब दुश्वार।

ये निगाहें अब भी तुम्हे ढूंढती हैं
और कब तक तुम्हे देते रहें आवाज।

परमीत सिंह धुरंधर

जिंदगी


जब गुजरता हूँ शहर के करीब से
तो बहुत याद आती हैं वो खाटों की लोरियाँ।

मैं तन्हा ही रह गया शहर में घुल के
इनसे अच्छी तो थी वो चुभती बालियाँ।

कौन कहता हैं की जिंदगी खुद की हाथों से संवरती हैं?
मैं भी जानने लगा हूँ कौन खींचता हैं ये डोरियाँ?

परमीत सिंह धुरंधर

जिंदगी का नशा


जिंदगी का नशा है जमीन से जुड़ने में
वरना आसमान तो पंखों को बस थकान देता है.
जितनी भी ऊँची हो उड़ान
आसमान पंक्षी को कहाँ विश्राम देता है?

परमीत सिंह धुरंधर

उम्र का सिला देखिये


मेरी उम्र का सिला देखिये
बहकते कदम, झुकी नजर देखिये।

मेरी उम्र का सिला देखिये
कपकपाते अधर, बलखाती कमर देखिये.

हसरते जवान, बेचैन धड़कने-२
रातों का इनका कहर देखिये।
मेरी उम्र का सिला देखिये।।

ना नैनों में नींद, ना मीठा कोई स्वप्न
मचलते अरमानों के सेज की दाहक देखिये।
मेरी उम्र का सिला देखिये।।

मेरी उम्र का सिला देखिये
हसीं गालों पे जुल्फों का भंवर देखिये।
मेरी उम्र का सिला देखिये।।

टूटे तारे रात भर जिसकी मोहब्बत में
उसके हुस्ना का ये सहर देखिये।
मेरी उम्र का सिला देखिये।।

बरसते बादल, चमकती बिजली
अम्बर में ये जुगल देखिये।
मेरी उम्र का सिला देखिये।।

परमीत सिंह धुरंधर