लाठाधीश-2


वो कौन हैं जिसपे वसुंधरा हर्षित है?
वो कौन है जिसपे हिमालय गर्वित है?
वो कौन है जिसे गंगा है पुकारती?
वो कौन है जो मगध की तस्वीर है?

दर्प जिसके मुख पे, भल दिव्यमान है
जब लठ लिए लाठाधीश है रण में
तो क्या सिंकदर और क्या काल है?

वीर तुम धनानंद, लाठाधीश हो
उठो, बढ़ो ऐसे की सिकंदर तक खौफ हो.
प्रखर, प्रबल, प्रचंड, प्रवीण हो
परांगत हर विद्या में, हर निति में निपुण हो.
नरों में स्वयं तुम इंद्रा हो
संपूर्ण आर्यावर्त के तुम सिंह हो.
इस पुण्य वसुंधरा पे तुम पूजित हो.
रूप में कामदेव, रण में परशुराम हो
विद्या – ज्ञान में साक्षात् वशिष्ठ हो.

वीर तुम धनानंद, लाठाधीश हो
उठो, बढ़ो ऐसे की सिकंदर तक खौफ हो.

Rifle Singh Dhurandhar

कहते हैं


कहते हैं की धुप में ना निकला करो
जवान बदन है, कुम्हला जाएगा।
ऐसे अनजान सड़क पे ना जाया करो
कोई भौंरा चुम के उड़ जाएगा।

कहते है की वो बचपन था, सुन्दर था,
जब तुम साथ में थे पिता
अब हालात ऐसे हैं, कोई कही से,
कभी भी लंगड़ी लगा जाएगा।

कहते हैं की खुद को संभाल लो
गिर जाने से पहले
भीड़ में अब कौन है?
जो दौड़ के तुम्हे उठाने आएगा।

कहते हैं की अपना दर्द किसी से ना कहो
जमाना फिर तुम्हे पत्थर का नहीं कहेगा।

Rifle Singh Dhurandhar

समंदर और छपरा का धुरंधर


समंदर मेरे है काबिल कहाँ?
लचका दूँ कमर तो, वो बेताबी कहाँ?
जिस बेताबी से मेरी नजर ढूंढती
वो बेताब छपरा का धुरंधर अब कहाँ?

कैसे समझाऊं ए माई अब तुझे?
मुझे ये सब कुछ नहीं चाहिए।
आभूषणों से मेरे अंग खिलते हैं कहाँ?
बेताब ये अंग मेरे ढूंढते
वो खिलाड़ी धुरंधर अब कहाँ?

Rifle Singh Dhurandhar

राजपूतों की लहू में अब भी वही उबाल है


राजपुताना की पावन धरती से उठी अब ललकार है
यह दहाड़ है हम सिंहों की, आगे जिसके दिल्ली लाचार है.
बदल के रख देंगें ये अरंकुश, अराजक सत्ता और सत्ताधीशों को
की राजपूतों की लहू में अब भी वही महाराणा सी उबाल है.

परमीत सिंह धुरंधर 

मैं खुद ही हूँ बिहार


मैं बिहार से नहीं, ना बिहार मुझसे है
मैं खुद ही हूँ बिहार.
भूख में- प्यास में, धुप में-छावं में
दुःख -दर्द में, हर एक एहसास में
जो मुझमे ले रहा है एक -एक पल सांस।
मैं खुद ही हूँ बिहार.

परमीत सिंह धुरंधर 

भारत के श्रवण कुमार: Sonu Sood


कहाँ छुप गइलन कन्हैया कुमार?
कहाँ फंस गइलन रविश कुमार?
कहाँ बारन, मनोज तिवारी, रवि किशन?
खेसारी लाल और बाकी दबंग सुपरस्टार।
मझधार के समय में बस सोनू सूद
ही बारन भारत के श्रवण कुमार।
मिले के चाहीं सोनू सूद जी के अब भारत रत्न
सुन ली हे मोदी जी इह हमनी के पुकार।

परमीत सिंह धुरंधर 

बीरबल की खिचड़ी


ट्रम्प और मोदी से नफरत
और गांधी परिवार के प्रति वफादारी में
वो कुछ ऐसे उलझे है
की उन्हें वृद्ध योषादाबेन का दर्द दिखाई पड़ता है
और सुनाई देता है २०१४ से आज तक
हर रात, हर पल.
लेकिन उन्हें अपने ही एक मित्र, साथी
नारी की चीत्कार नहीं सुनाई दी
ना उस रात, ना आज बर्षो बाद.

Dedicated to all PhD colleagues specially females from my institutes.

परमीत सिंह धुरंधर

आधुनिक भारत में सामाजिक न्याय-2


चोरी की सजा काट कर
मैं बाहर निकला।
घंटों रुक -रुक कर
कभी सूर्य
कभी पक्षियों के समूह गान को
सुन रहा था.
कोई जल्दी नहीं थी
कहीं जाने की.
एक चौराहे पे देखा
वही न्याय की देवियाँ विराजमान थीं
कुछ बोल रहीं थी.
मैंने सुना
वो आज की भारत में
नारियों के अधिकार पे बोल रही थीं.
वो बता रह थी
पुरुष अपनी मानसिकता नहीं बदल रहा
इसलिए ये बलात्कार
ये नारियों का शारीरिक शोषण
आधुनिक भारत में नहीं रुक रहा.
एक अकेली नारी को देख
ये पुरुष ऐसे टूट पड़ते हैं
जैसे निरीह गाय पे सिंहों का झुण्ड।
……
हर चौराहे पे ये ही हो रहा था
भारत की नारियाँ
अपनी सुरक्षा
समानता
अपने हक़ के लिए सड़कों पे
अपनी आवाज उठा रही थी.
वो रो रही थीं
वो सत्कार कर रही थीं
भूख हड़ताल
आमरण -अनशन
और जंतर-मंतर पे प्रदर्शन कर रही थीं.
वो न्याय की देवियाँ होकर
अपनी किसी बहन के लिए
न्याय मांग रही थी.
और ये क्या?
वो जिस बहन के लिए
न्याय मांग रही थी
विलाप कर रही थीं
वो कोई और नहीं
वो वही कुलटा थी
जिसे इन्हीं देवियों ने
मेरे साथ उस दिन न्यायलय में दंड दिया था.
…….
और मैं स्तब्ध
देख रहा था
मगध के नन्द साम्राज्य और उसके
धनानंद को
जो अपने उत्कर्ष पे था.
……

परमीत सिंह धुरंधर