होली छपरा के धुरंधर से


सरहदों को पता ही न चला
सितमगर, सितम कर गया.
मैंने तो कस कर बाँधी थी चोली
हरजाई जाने कैसे फिर भी रंग डाल गया.

सखी, अब ना खेलने जाउंगी
होली छपरा के धुरंधर से.
निर्मोही तन ही नहीं
मेरा मन भी रंग गया.

परमीत सिंह धुरंधर

कमरे में दिया


खूबसूरत जिस्म पे जवानी का नशा
सखी, कटती नहीं रातें अब तो बालम बिना।
आँखों का काजल सुलगता है पूरी रात
जैसे जलता है मेरे कमरे में दिया।

परमीत सिंह धुरंधर

शराफत


शहर समझता है नादान हमें
शहर को क्या पता?
रोशन है ये शहर हमसे।

सांझ ढले वो आ जाती है छत पे
बदनाम हम हैं, मगर वो भी कब से
हैं अपनी शराफत छोड़ चुके।

परमीत सिंह धुरंधर

तीन – तलाक पढ़ गयी


दुनिया छोटी पर गयी अब तो
मेरी प्यास इतनी बढ़ गयी
अरे जब से तुझपे नजर मेरी पड़ गयी.

सब इतने दीवाने हैं महफ़िल में तेरे रूप पे
कितनो की बीबी उनको
तीन – तलाक पढ़ गयी.

परमीत सिंह धुरंधर