मैं खुद ही हूँ बिहार


मैं बिहार से नहीं, ना बिहार मुझसे है
मैं खुद ही हूँ बिहार.
भूख में- प्यास में, धुप में-छावं में
दुःख -दर्द में, हर एक एहसास में
जो मुझमे ले रहा है एक -एक पल सांस।
मैं खुद ही हूँ बिहार.

परमीत सिंह धुरंधर 

भारत के श्रवण कुमार: Sonu Sood


कहाँ छुप गइलन कन्हैया कुमार?
कहाँ फंस गइलन रविश कुमार?
कहाँ बारन, मनोज तिवारी, रवि किशन?
खेसारी लाल और बाकी दबंग सुपरस्टार।
मझधार के समय में बस सोनू सूद
ही बारन भारत के श्रवण कुमार।
मिले के चाहीं सोनू सूद जी के अब भारत रत्न
सुन ली हे मोदी जी इह हमनी के पुकार।

परमीत सिंह धुरंधर 

बीरबल की खिचड़ी


ट्रम्प और मोदी से नफरत
और गांधी परिवार के प्रति वफादारी में
वो कुछ ऐसे उलझे है
की उन्हें वृद्ध योषादाबेन का दर्द दिखाई पड़ता है
और सुनाई देता है २०१४ से आज तक
हर रात, हर पल.
लेकिन उन्हें अपने ही एक मित्र, साथी
नारी की चीत्कार नहीं सुनाई दी
ना उस रात, ना आज बर्षो बाद.

Dedicated to all PhD colleagues specially females from my institutes.

परमीत सिंह धुरंधर

आधुनिक भारत में सामाजिक न्याय-2


चोरी की सजा काट कर
मैं बाहर निकला।
घंटों रुक -रुक कर
कभी सूर्य
कभी पक्षियों के समूह गान को
सुन रहा था.
कोई जल्दी नहीं थी
कहीं जाने की.
एक चौराहे पे देखा
वही न्याय की देवियाँ विराजमान थीं
कुछ बोल रहीं थी.
मैंने सुना
वो आज की भारत में
नारियों के अधिकार पे बोल रही थीं.
वो बता रह थी
पुरुष अपनी मानसिकता नहीं बदल रहा
इसलिए ये बलात्कार
ये नारियों का शारीरिक शोषण
आधुनिक भारत में नहीं रुक रहा.
एक अकेली नारी को देख
ये पुरुष ऐसे टूट पड़ते हैं
जैसे निरीह गाय पे सिंहों का झुण्ड।
……
हर चौराहे पे ये ही हो रहा था
भारत की नारियाँ
अपनी सुरक्षा
समानता
अपने हक़ के लिए सड़कों पे
अपनी आवाज उठा रही थी.
वो रो रही थीं
वो सत्कार कर रही थीं
भूख हड़ताल
आमरण -अनशन
और जंतर-मंतर पे प्रदर्शन कर रही थीं.
वो न्याय की देवियाँ होकर
अपनी किसी बहन के लिए
न्याय मांग रही थी.
और ये क्या?
वो जिस बहन के लिए
न्याय मांग रही थी
विलाप कर रही थीं
वो कोई और नहीं
वो वही कुलटा थी
जिसे इन्हीं देवियों ने
मेरे साथ उस दिन न्यायलय में दंड दिया था.
…….
और मैं स्तब्ध
देख रहा था
मगध के नन्द साम्राज्य और उसके
धनानंद को
जो अपने उत्कर्ष पे था.
……

परमीत सिंह धुरंधर

आधुनिक भारत में सामाजिक न्याय


मैंने कहा, “मैं चोर नहीं हूँ.”
न्याय की कुर्सी से आवाज आई
तुम ही चोर हो.
उन कुर्सियों पे बैठी थी नारियाँ
न्याय की देवियाँ
और उनके पीछे खड़े थे, पुरुष।
……
और मैंने देखा
न्याय की देवियों की आँखे
देख रही थीं नफ़रत से
मेरे सर पे तितर-बितर बाल को
चिपटे – नाक को
मोटे-भद्दे, बाहर निकले मेरे होंठ को
और मेरे काले कुरूप काया को.
……
बेड़ियों में जकड़ा मैं
देख रहा था
ब्रिटिश-सम्राज्यवाद के न्याय को
जो अपने उत्कर्ष पे था.
……
अंत में कटघरे में लायी गयी
एक सुन्दर सी नारी
जिसका मुख
सूर्य की किरणों सा दिव्या था
और वक्ष
हिमालय सा उन्नत।
बिना उसके शब्दों को सुने
न्याय की देवियों ने
एक स्वर में कहा, “ये ही कुलटा है.”
इसने ही अपने अंगों की मादाकता
और अपने नयनों की चंचलता
अपने यौवन की मधुरता
से उस भीड़ को उकसाया था.
जैसे कोई किसान
स्वछंद चरते किसी पशु को
कोई बालक
शांत बैठे मधुमखियों को
उकसाता है.
अतः, इसका अपराध
शास्त्रों के अनुसार
निंदनीय नहीं, दण्डनीय है.
……
और मैं स्तब्ध
देख रहा था
वैशाली के गणराज्य को
गणतंत्र को
जो अपने उत्कर्ष पे था
……..

परमीत सिंह धुरंधर

अब अनंत हो गयी


जहाँ दर्द मिटे दिल का
वो नयन कहाँ मेरे?
जिसे बाँध लूँ बाहों में
वो ख्वाब कहाँ मेरे।

इन तारों -सितारों की
किस्मत नहीं मेरी
जो दूर करे मेरा अँधियारा
वो दीप कहाँ मेरे?

यह प्यास मेरे दिल की
अब अनंत हो गयी
जो अंत करे इसका
वो अधर कहाँ मेरे?

परमीत सिंह धुरंधर 

यूँ ना दिल को मेरे तोड़ो


यूँ ना दिल को मेरे तोड़ो
ये रातों का नशा नया है
अभी-अभी तो निगाहें लड़ी हैं
अभी-अभी तो शर्म का पर्दा गिरा है.

दो पल ही सुला कर जुल्फों में
ऐसे ना बिजली गिरावों
अभी-अभी तो सावन बरसा है
अभी-अभी तन -मन ये भींगा हैं.

परमीत सिंह धुरंधर