सर्वधर्म समभाव हो यारो


सर्वधर्म समभाव हो यारो
सर्वधर्म समभाव।
किसी के दर्द पे ना कोई हँसता हो
ऐसा हो मनभाव।

सबके हाथ में कलम हो
सब बढ़ाएं देश का मान.
सर्वधर्म समभाव हो यारो
सर्वधर्म समभाव।

प्रेम -धारा जहाँ बहे निरंतर
ना द्वेष का हो स्थान।
सर्वधर्म समभाव हो यारो
सर्वधर्म समभाव।

बुझ जाए जहाँ बिरहा की आग
ऐसा हो कोई एक पड़ाव।
सर्वधर्म समभाव हो यारो
सर्वधर्म समभाव।

अपना बिहार है सबका बिहार
चाहे हिन्दू हो या मुसलमान।
सर्वधर्म समभाव हो यारो
सर्वधर्म समभाव।

परमीत सिंह धुरंधर 

धर्म


बात – बात में खून बहाते हो,
चाँद लकीरों के नाम पे.
मेरा तो धर्म, मजहब, ईमान,
सब वहाँ है,
जहाँ वो अपने केसुओं को बिछा दें.
सबसे बड़ा धर्म माँ की गोद,
सबसे बड़ी इबादत,
महबूब की आगोश है.
इसके मिलने पे,
जन्नत-जहन्नुम का भेद मिट जाता है.

 

परमीत सिंह धुरंधर

धर्म


सर्द रातों में जब जिस्म कराहता है,
तो गोरे-काले में भेद मिट जाता है.
और जब अतड़िया पिसती हैं भूख से,
तो मंदिर-मस्जिद में भेद मिट जाता है.
बच्चा ढूंढता है बस माँ का स्तन, तब
पशु और इंसान में भेद मिट जाता है.
धर्म और मजहब की लकीर ढूढ़ने वालो,
जब मौत आती है,
गिद्ध नाचने लगते हैं,
तो धर्म का हर भेद मिट जाता है.

परमीत सिंह धुरंधर