सावन की ये काली घटायें


गगन को मगन करके
बादलों में दामनी को चंचल करके
सावन की ये काली घटायें
धरा पे मृग, मोर, पुष्प को
प्रेम से पुलकित कर रहे.
भ्रमर को भ्रमित करके
नवयौवना के ह्रदय को झंकृत करके
सावन की ये काली घटायें
बरसो की विरह को नवरस
से पराजित कर रहे.

दूर बस तुम्ही हो मेरे साजन।
दिन साल हुए, साल विशाल हुए
तुम जाने किस मोहनी के मोह में
मेरी साँसों को निष्प्राण कर रहे.
नसों में नशा उतारू तो क्यों?
अधरों पे प्यास बसाऊं तो क्यों?
उर्वरित धरा को जब तुम
बीज-रहित रख रहे.
सावन की ये काली घटायें
तुम्हारे बाजुपाश-रहित
मेरे मन को व्यथित कर रहे.

RSD

Framers are crying


In today’s world
we have solar systems
solar house, solar cells, and solar car.
But we don’t care about
tree, plant, and farmers.
Tree as the oldest and natural transformer
that converts solar energy into foods
and farmers as an only engineers
that make those transformers.

In today’s world,
we are going beyond the stratosphere.
We are making digital emotions.
We are having our cloud
But at the cost of our ecosystem.
We talk about globalization as well as global warming.
While we are playing share markets and
growing Bitcoins and cryptocurrency.
Our biosphere is shrinking
Our animals, plants, and framers are crying.

Rifle Singh Dhurandhar

फितरत


कहती है दरिया उछाल कर,
किनारों के टूटने में हैं आनंद.
कब तक मुझे बांधोगे,
अपने बंधन में यूँ रख कर.
कहती है दरिया उछाल कर,
कहती है दरिया उछाल कर.
आई हूँ मैं इठलाकर,
जाऊंगीं मैं बलखाकर.
मेरी तो ये ही फितरत है,
सब कुछ ले जाऊंगीं बहाकर.
कहती है दरिया उछाल कर,
कहती है दरिया उछाल कर.

परमीत सिंह धुरंधर

प्रकृति


सूर्य कहते हैं,
प्रखर बनो.
हवा कहती है,
बहते रहो.
नदिया कहती है,
जोश से जियो.
और किनारें कहते हैं,
प्रेम में टूट चलो.
वृक्ष कहते हैं,
सदा ऊपर उठो.
कलियाँ कहती है,
खिलते रहो.
फूल कहते हैं,
समाज को,
सुगन्धित करो.
और भौरें कहते हैं,
विचरते रहो.
लहरें कहती हैं,
उछल कर वार करो.
चाँद कहता है,
शीतल बनो.
अग्नि कहती है,
खुद पहले जलो.
और बादल कहते हैं,
बरसने में ना,
भेद करो.
रात कहती है,
दीपक बनो.
दिया कहता है,
पथ प्रदर्शित करो.
पत्थर कहते हैं,
स्थिर रहो.
और राहें कहती है,
मंजिल की तरफ,
बढ़ते रहो.
उषा कहती है,
श्रम करो.
साँझ कहती है,
मनन करो.
फल कहते हैं,
मिठाश बांटों.
और काटें कहते हैं,
स्वीकार करो.
दर्पण कहता है,
सत्य समझों।
जीवन कहता है,
समय का मान करो.
समय कहता है,
त्याग करो.
और मोह कहता है,
बलिदान करो.

परमीत सिंह धुरंधर