नारायण, भोलेनाथ और भगवान्


आम -कटहल
गेहूँ -धान
जामुन -लीची
इन नामों को किसान जीवन देता है.
ख़्वाबों को हकीकत
और जिव्हा को स्वाद देता है.

परमार्थ क्या, स्वार्थ क्या?
अरे राजा के यज्ञ
और ब्राह्मणों के हवन -कुंड में
देवताओं के आव्हान को
सफल करने को घी और अन्न देता है.

धरा को सुंदरता -सौम्यता
पक्षी – कीट, मूषक को
परिश्रम का मौक़ा
गाय – बैल को देवी -देवता
और पत्नी को गृहलक्ष्मी बनने
का सुनहरा अवसर देता है.

पुत्र को आलस
पुत्री को अच्छे वर का ख्वाब
चिलचिलाती धुप और कड़कड़ाती ठंढ में
उषा के आगमन पे
बिना विचलित हुए
किसान हाथों में अपने
हल थाम लेता है.

इंसान इसी रूप में
मुझे नारायण, भोलेनाथ
और भगवान् लगता है.

परमीत सिंह धुरंधर 

वो जिस्म में एक दिल रखते हैं


मेरे बैलों के दो सींग हैं
जिसपे वो मेरे आन – शान
को धारण करते हैं.
क्यों की वो जिस्म में एक दिल रखते हैं.

कड़ाके की सर्दी हो
या भीषण गर्मी
बहते हैं दोनों झूम-झूम के.
मेरे तपते पीठ और ठिठुरते जिस्म
की खबर रखते है.
क्यों की वो जिस्म में एक दिल रखते हैं.

मेरे बच्चों की भूख
मेरे परिवार के भविष्य
का ख्याल रखते हैं.
मेरे बैलों के दो सींग हैं
जिसपे वो मेरे आन – शान
को धारण करते हैं.
क्यों की वो जिस्म में एक दिल रखते हैं.

जब तक ना बांध दूँ
दोनों को नाद पे
पहला खाता नहीं है.
और बाँधने के बाद दूसरा
पहले को खाने नहीं देता है.
नित – निरंतर, नाद पे, खूंटे पे
खेत में, बथान में
अपने सींगों को उछाल – उछाल
वो प्रेम की नयी परिभाषा रचते है.
क्यों की वो जिस्म में एक दिल रखते हैं.

खाते हैं घास – फुस
इठला कर, उमंग से
पर नाद में सने नाकों से
घर के पकवानों पे नजर रखते हैं.
अपने हाथों से गृहलक्ष्मी जो ना
उन्हें भोग लगाए
तो फिर नए पकवानो के तलने
और भोग तक उपवास करते हैं.
क्यों की वो जिस्म में एक दिल रखते हैं.

 

परमीत सिंह धुरंधर

मस्ती में बहो मेरे बैलों


दुल्हन सी सजा दू धरती,
सावन सा आँचल इसका।
ऐसे मस्ती में बहो, मेरे बैलों,
की चमक उठे हर कोना इसका।
प्यासे हर कण की,
प्यास मिटा दूँ अपने पौरष से.
हर बदली, हर दरिया, फिर चाहे,
भिगोना बस आँचल इसका।

 

परमीत सिंह धुरंधर

भारतीय नारी और उसकी सुरक्षा


धरती बेचैन हैं,
बादल बेताब है.
ऐसी है मोहब्बत,
की दोनों बेलगाम हैं.
वो बरसता हैं उमड़-उमड़ के,
वो लहराती हैं मचल-मचल के.
दोनों के बीच है दूरी, लाख योजन की,
पर रिश्ता ये बेमिसाल है.
जब पतझड़ आता हैं,
सब कुछ हर जाता है.
अपने योवन में मस्त बैल,
दौड़ – दौड़ के,
सुनी धरती को सजाता हैं.
तो कोना – कोना धरती का,
सोना बनके लहलहाता हैं.
अनपढ़ – गवार, भारत का किसान,
जिसकी मुठ्ठी में, भूख और प्यास है.
जब हल लिए काँधे पे,
खेतो में जाता है,
तो सावन छा जाता है.
इठलाती है धरती दुल्हन सी,
और खेत – खलिहान भर जाता है.
ऐसी है मोहब्बत,
रिश्ता ये बेमिसाल है.

परमीत सिंह धुरंधर