अटल हो कर अनंत तक


ना गूढ़ रहो, ना मूढ़ रहो
मानव हो तो सरल रहो.
है हाथ में कलम तो
सत्य को साकार करो.
ना तो हल को धारण
कर किसान बनो.
हो अगर वंचित दोनों से
तो तन का श्रम से श्रृंगार करो.

जीवन का सार यही
गीता में प्रमाण यही
जय-विजय की कामना से रहित
अपने पथ का, अपनी मंज्ज़िल तक
स्वयं निर्माण करो.
अन्यथा भगीरथ सा
अटल हो कर, अनंत तक
अंतिम प्रयास करो.

RSD

है जिंदगी कितनी खूबसूरत


है जिंदगी कितनी खूबसूरत अभी इन्हे पता नहीं है
पिता के पथ के पत्थरों का जिन्हे अभी तक पता नहीं है.
आँखों की जिनकी मीठी नींद को माँ कई रात सोइ नहीं है.
माँ के चरणों में जिन्होंने सर अभी तक झुकाया नहीं है.
है जिंदगी कितनी खूबसूरत अभी इन्हे पता नहीं है.
क्या लिखें शब्दों में तुम्हे, आँखों ने तुम्हारे बाद कोई देखा नहीं है?
प्यासे हैं वो ही अधर, जिन्होंने शिव भांग आपका चखा नहीं है.
है जिंदगी कितनी खूबसूरत अभी इन्हे पता नहीं है.

RSD

Life


Don’t work so hard
Just to achieve a goal.
Life is beyond
whatever you know.
Nothing is permanent.
Nothing is pure.
Someone has to die
Single, alone, and without gold.

We all try for love.
We all cry for love.
Don’t try so hard
to chase someone.
Life is beyond
whatever you know.
Someone has to die
Single, alone, and without gold.

Socrates got poisons for his knowledge.
Mira got too, but for her pure love.
Knowledge and love
Both are injurious to health.
Life is beyond
whatever you know.
Someone has to die
Single, alone, and without gold.

Riffle Singh Dhurandhar

फूल


जहाँ दर्द मिले दिल को उस दर पे नहीं जाना
बहुत धोखा है इश्क़ में, ये धोखा तुम नहीं खाना।
जो फूल खिल रहे हैं, मुरझा जाएंगे एक दिन
बिना खिले ही तुम मुरझा नहीं जाना।
माना की लम्बी है बहुत, अँधेरी ये रात
घबराकर कहीं तुम कोई ठोकर नहीं खाना।
बहुत हंस कर मिलते है अब लोग अब
ऐसे लोग भले नहीं होते
तुम ऐसे लोगो के गले लग नहीं जाना।
कट जाएगा ये भी वक्त तन्हाई से भरा
रिश्तों में दरार नहीं लाना।

Rifle Singh Dhurnadhar

यह कुरुक्षेत्र है दोस्तों


दिल से लीजिये
दिल नहीं है तो
दिमाग से लीजिये
मगर फैसला तो लेना ही होगा।
यह कुरुक्षेत्र है दोस्तों
हौसला नहीं भी हो तो लड़ना ही होगा।
पलट तो सकते नहीं
मुख को मोड़ सकते नहीं
सोचने – समझने का अब कुछ नहीं
हाथ में अपने कुछ नहीं
कर्म का अब वक्त नहीं
सब निश्चित और सुनिश्चित है
उसको बदल पाना अब मुमकिन नहीं।
हसरतें, चाहतें सब छोड़कर
इरादों को बुलंद करना ही होगा।
यह कुरुक्षेत्र है दोस्तों
हौसला नहीं भी हो तो लड़ना ही होगा।
जो सम्मुख हैं
वो विमुख हैं
जो संग हैं खड़े
वो तो अप्रत्यक्ष हैं
अपने लक्ष्य के भेदन के लिए
अपने गांडीव पे तीरों का अव्वाहन करना ही होगा.
यह कुरुक्षेत्र है दोस्तों
हौसला नहीं भी हो तो लड़ना ही होगा।

परमीत सिंह धुरंधर

जिंदगी का नशा


जिंदगी का नशा है जमीन से जुड़ने में
वरना आसमान तो पंखों को बस थकान देता है.
जितनी भी ऊँची हो उड़ान
आसमान पंक्षी को कहाँ विश्राम देता है?

परमीत सिंह धुरंधर

जीवन-पथ पे भीष्म सा त्याग करो


जो मिले हैं, उनको प्यार करो
जो बिछुड़ गए, उन्हें याद करो
तुम मानव हो, बिना बिचलित हुए
इस जीवन-पथ पे, निरंतर प्रयास करो.

तुम देव नहीं, जो भोग मिलेगा
तुम पशु नहीं जो स्वछन्द विचरण करेगा
तुम मानव हो, बिना विचलित हुए
इस जीवन-पथ पे, निरंतर अभियान करो.

पथ में कुछ छाले मिलेंगें
पथ में कुछ कांटे भी मिलेंगे
सुन्दर अप्सराएं कभी,
दिखलायेंगी अपनी अदायें
तुम अपने ह्रदय से अब
माया-मिलन-मोह का त्याग करो.
तुम मानव हो, बिना विचलित हुए
इस जीवन-पथ पे, निरंतर हुंकार भरो.

क्या है नारी के देह में?
और क्या है उसके वक्षों पे?
कौन है सुन्दर वो नारी जो?
गृहणी बनकर संतुस्ट हुई
और कौन तृप्त हुई?
भला नगर-वधु बनकर।
तुम मानव हो, बिना विचलित हुए
इस जीवन-पथ पे, भीष्म सा त्याग करो.

परमीत सिंह धुरंधर

बरसे भी तो जलती ही आग है


कण – कण में व्याप्त है
फिर भी अपर्याप्त है
लालसा है मन की
या लिखित बेचैन ही भाग्य है.
अंत नहीं भूख का
जहाँ मौत भी एक प्यास है.
आँखों के काजल सा
बिजुरी में बादल सा
बरसे भी तो हाँ, जलती ही आग है.
दिखता नहीं
निकलता नहीं
छुपता नहीं, फिर भी
रौशनी के मध्य
एक अदृश्य – अन्धकार है.

नयनों के खेल सा सा
दिलों के मेल सा
जो तोड़े न मन को
जो जोड़े ना तन को
जिससे मिलन को
हर पल उठती हाँ टिस है
मधुर मिलन पे फिर
लगती भी ठेस है.
ऐसी है वासना
फिर भी है छोटी
आगे उसके
ऐसा अनंत तक उसका विस्तार है.

बांधों तो वो बांधता नहीं है
साधो तो वो सधता नहीं है
कालचक्र से भी परे है वो
काल से भी वो मिटता नहीं है.
सृष्टि उसके बिना अपंग – अपूर्ण है
और उसके संग सृष्टि, नग्न – न्यून है.
है मिश्री के मिठास सा
अंगों पे श्रृंगार सा
नारी जिसके बिना सुखी एक डाल है.
और यौवन जिसके बिना हाँ बस एक लास है.

परमीत सिंह धुरंधर

माहिर


निकला था राजकुमार सा
अब मुसाफिर हो गया हूँ.
ए जिंदगी देख तेरे इस खेल में
एक मासूम मैं, कितना शातिर हो गया हूँ?

देखता था हर एक चेहरे में माँ और बहन ही
पर इनकी नियत और असलियत देख कर
मैं भी अब माहिर हो गया हूँ.

परमीत सिंह धुरंधर

किसके लिए?


अजीब दास्ताँ है ये, खुद हमारे लिए
ये शहर मेरा नहीं तो मुस्करायें किसके लिए?

दफ़न कर चूका हूँ जो ख्वाइशें कहीं
उन्हें सुलगाऊँ भी तो अब किसके लिए?

वो छोड़ गयीं मुझे एक ही रात के बाद
अब घर बसाऊं भी तो किसके लिए?

यादों का गठबंधन तोड़े कैसे पिता?
जब तुम ही नहीं तो जीयें किसके लिए?

खुदा भी जानता है की हम है अकेले
खुशियाँ बाटूँ भी तो किसके लिए?

जमाने से दुश्मनी है मेरी सदियों से
जमाने से बना के रखूं भी तो किसके लिए?

मुबारक हो हिन्द, जिन्हे मंदिर – मस्जिद चाहिए
मैं सजदा करूँ भी तो अब किसके लिए?

परमीत सिंह धुरंधर