July 30, 2020-Happy Begam Day


मोहब्बत मुझे होती नहीं
और शरारत उन्हें आती नहीं
पर दिल हैं दुआओं में मेरा
की बेगम खिलाना मुझे छोड़ती नहीं।

कभी लड़ कर, कभी रो-रोकर
कभी सज-संवर कर, इठलाकर
थाली परोसना वो भूलती नहीं।

सच्ची मित्र, सच्ची सखा वो ही है
जो हर दिन गाली देने पर भी
मेरे लिए मछली तलना
चूल्हे पे गर्मी में भी, भूलती नहीं।

तो खिलाओ, पिलाओ
अपनी बेगम को दोस्तों
जैसे खिलाते -पिलाते हो
दूसरों की बेगम को दोस्तों।

Rifle Singh Dhurandhar

Father and Ex


I missed my father
More than my ex
As that was the best father-son pair
That was selected by Nature.

My ex and I
Were just a choice made by us
And we were still looking
To find the best.

The love between my father and me
Was blind
Without any expectation
Full of appreciation and enjoyment.

The love with my ex
Was a force, which strength was
Proportional to my success rate
But my success rate was inversely proportional
To the availability of another successful man.

Rifle Singh Dhurandhar

पिता और मेरा प्रेम


पिता और मेरा प्रेम
जैसे गंगा की लहरों पे
उषा की किरणें
और प्रकृति मुस्करा उठी.

हर्षित पिता मेरी उदंडता पे
उन्मादित मैं उनकी ख्याति पे
पिता -पुत्र की इस जोड़ी पे
प्रकृति विस्मित हो उठी.

अभी जवानी चढ़ी ही थी
अभी मैं उनके रथ पे चढ़ा ही था
की प्रकृति ने
विछोह की घड़ी ला दी.

Rifle Singh Dhurandhar

The day I turned 18


The day I turned 18
The world was changed
I started enjoying the mirror more than the wind.
I understood the relationship
Of the flower and bumblebee
Without reading the chapter on pollination.

I loved the change I was witnessing
Inside and outside of my body
Everything was like a slow music
Or like a water stream
Until I was forced on bed
To teach what love is.

Rifle Singh Dhurandhar

Menopause


It’s my body but with your sweats
My eyes but having your dreams
My dried lips with your smells
I don’t know
It’s my soul or you living inside me.

It’s my heart but beats for you
My veins carry blood that only boils for you
The adrenal glands, fat cells,
The placenta and the ovaries are my organs
But you stimulate them to make estrogen
Without you, they are on menopause.
I don’t know
It’s my body or you living inside me.

Rifle Singh Dhurandhar

काँटों की शहनाई


मैं तन्हा हूँ तन्हाई में
दिल की रुसवाई में
फूल हैं दूर -दूर
मैं काँटों की शहनाई में.

बहारें राहें बदल रहीं
मुझको ही देखकर
किस्मत के तारे सारे
बैठें मुख मोड़कर।
चाँद छुप गया कहीं
सूरज प्रखर बदली में.

आँखे जिसको ढूंढती
ह्रदय जिसको चाहता
उसकी ही कामना
मैं मिट जाऊं परछाईं से.

ये अधूरापन
दिल को डस रहा मेरे
नयनों के ख्वाब भी
हैं अब विष के प्याले से.

Rifle Singh Dhurandhar

आप अंत हो अनंत के


आप अंत हो अनंत के
हे शिव, आप हो समस्त के.
ज्ञानियों के ज्ञान में
प्राणियों के प्राण में
हे शिव, आप स्वयं हो
श्री राम के ध्यान में.
आप अंत हो अनंत के
हे शिव, आप हो समस्त के.

जिसने गरल को सौंदर्य दिया
धारन कर कंठ में
और गंगा को बाँध लिया
अपने जटाओं के भंवर में.
हे शिव, आप हो समस्त में
हे शिव, आप हो समस्त के.

Rifle Singh Dhurandhar

समंदर और छपरा का धुरंधर


समंदर मेरे है काबिल कहाँ?
लचका दूँ कमर तो, वो बेताबी कहाँ?
जिस बेताबी से मेरी नजर ढूंढती
वो बेताब छपरा का धुरंधर अब कहाँ?

कैसे समझाऊं ए माई अब तुझे?
मुझे ये सब कुछ नहीं चाहिए।
आभूषणों से मेरे अंग खिलते हैं कहाँ?
बेताब ये अंग मेरे ढूंढते
वो खिलाड़ी धुरंधर अब कहाँ?

Rifle Singh Dhurandhar

छापरहिया एक बादल


मेरे मुख का दर्प ये ही हैं
ये ही हैं मेरे सागर।
पाकार इनसे जीवन-अमृत
हुआ मैं दम्भ में पागल।

अट्टहास लगाता जीवन में हूँ
की कोई छीन नहीं सकता मेरे ये आनंद।
सुशीला- धुरंधर का लाल मैं
फीका जिसके आगे स्वर्ग, मेनका का आंचल।

उसपे मैं तोमर राजपूत
और छापरहिया एक बादल।
जहां पे मैं ठहर जाऊं
वहीँ पे बरसे सावन।

The poem is written for my father and mother. It is the best blessing I have in my life.

Parmit Singh Dhurandhar

मैं


मुझे डुबाने के लिए ज़माने ने जब भी मशक्कत की
मैं उसकी लहरों पे और उभरा हूँ.

परमीत सिंह धुरंधर