रूप और धुप दोनों पल – दो – पल के मेहमान हैं
ढलते हैं, तो बचता कोई नहीं इनका निशाँ हैं.

वृक्ष अगर साथ हो तो फिर धुप भी मीठी छावं हैं
वफ़ा में घुला रूप तो अमृत सामान है.

परमीत सिंह धुरंधर

वो ही ना बंध सके हमसे


समंदर को बाँध लिया मैंने
कलंदर को बाँध लिया मैंने
बस एक वो ही ना बंध सके हमसे
दिलो -जान से जिससे मोहब्बत किया मैंने.

Dedicated to my favorite poet Shiv Kumar Batalvi.

परमीत सिंह धुरंधर

कलमुही का ह्रदय तेरा बटुआ जानता है


चाँद मेरी आँखों का इशारा जानता है
क्या करता है Crassa ये जमाना जानता है?
अच्छा है की तू मेरी ना बनी, आज भी तेरे पीछे
दिल मेरा, दीवाना भागता है.

XXXXXXXXX part2 by wife XXXXXX

यूँ शहर का नशा ना किया कर Crassa
तेरे लिया दही का निकला है मक्खन ताजा।
यूँ सौतन के पास ना जाया कर राजा
सारी रात मुझको, मेरा जोबन तोड़ता है.
दर्द क्या है विरह का, ये मेरा ह्रदय जानता है?
कहाँ – कहाँ मुँह मारता है Crassa, ये जमाना जानता है?

यूँ जन्मों का बंधन ना तोड़ो तुम Crassa
तुम्हारे लिए उठाउंगी जीवन की हर पीड़ा।
यूँ सौतन के पास ना जाया कर राजा
सजी – सजाई सेज, अब गरल लगता है.
अच्छा है की मैं ही तेरी हाँ बनी
उस कलमुही का ह्रदय, बस तेरा बटुआ जानता है.

This poem is dedicated to Panjabi poet Shiv Kumar Batalvi.

परमीत सिंह धुरंधर

तू घूँघट जो उठा दे


दो नैना तेरे काले – काले, चल रहे हैं जमाना
तू घूँघट जो उठा दे तो, दहक जाए ये जमाना।
कमर तेरी बलखाये, जिसका सागर है दीवाना
तू घूँघट जो उठा दे तो, बहक जाय ये जमाना।

अंग – अंग पे जैसे बहार आयी है
कमर हुई है वीणा, नयन कतार हुई है.
ये धुप है या छावं, तप रहा है ये जमाना
तू घूँघट जो उठा दे तो, चालक जाए ये पैमाना।

परमीत सिंह धुरंधर

घूँघट


चाँद बनो तुम तो रात का फिर नशा भी हो जाए
ख्वाब बनो तुम तो धड़कनों को मुकाम मिल जाए.

कब तक रखोगे यूँ हमसे घूँघट मुख पे रानी
ये घूँघट हेट तो अधरों का मिलन भी हो जाय.

परमीत सिंह धुरंधर

तेरा रंग है सच्चा मेरी लाडो


यूँ चहका ना कर लाडो
नजर में शिकारी के आ जायेगी।
अभी तो एक कच्ची कलि है तू
बिना खिले ही मुरझा जायेगी।

यूँ निकला ना कर बाहर लाडो
नजर में गिद्धों के आ जायेगी।
अभी तो मासूम है बड़ी तू
बिन उड़े ही पिंजरे में आ जायेगी।

तेरा रंग है सच्चा मेरी लाडो
पर अब ये बस्ती सच्चा नहीं।
यूँ किसी से ना मिला कर लाडो
नजर में बाजों के आ जायेगी।
अभी पंख तेरे कमजोर हैं
पंजे में दुश्मनों के आ जायेगी।

परमीत सिंह धुरंधर