अभियान


मदहोशियों की रात थी
जब तुम मेरे साथ थी
साँसों का बहाव था
घोंसलों में पड़ाव था.

पंखों को समेटे
आँखों को मूंदे
रक्त के तीव्र प्रवाह
में मिल रहे थे अंग – अंग
जाने कैसा वो अभियान था.

परमीत सिंह धुरंधर

थोड़ी – थोड़ी


किसको मैं प्यार करूँ?
ये दिल तू ही बता
वो हर रात थोड़ी – थोड़ी
मुझसे दूर जा रही हैं.

कोई और भी तो नहीं है
जो मेरी नशों में ऐसा रास घोले
वो तो अब इन नशों में
उतरने से इंकार कर रही हैं.

परमीत सिंह धुरंधर

आस


आज अभी इस रात को तुझे पाने की चाह है
जानता हूँ ये मुमकिन नहीं पर दिल को एक आस है.

परमीत सिंह धुरंधर

खुशबु मेरी मिटटी की


मगरूर जमाना क्या समझे खुशबु मेरी मिटटी की?
जहाँ धूल में फूल खिलते हैं बस पाके दो बूंदें पानी की.

मगरूर जमाना क्या समझे खुशबु मेरी मिटटी की?
एक बूढ़े ने बदल दी थी सनकी सियासत दिल्ली की.

परमीत सिंह धुरंधर

गुस्ताखियाँ


मैंने चाहा जिस समंदर को
उस समंदर की अपनी हैं गुस्ताखियाँ।

जिन लहरों पे मैंने बिखेर दिया पाने ख्वाब
वो ही लहरें डुबों गयीं मेरी किश्तियाँ।

मजधार में मुझे बाँध कर
साहिल पे बसा रहीं हैं गैरों की बस्तियाँ।

परमीत सिंह धुरंधर

उसकी आँखों में क्या दर्द दे गए?


जिसे खेत में लूट कर तुम नबाब बन गए
उससे पूछा क्या कभी?
उसकी आँखों में क्या दर्द दे गए?
एक चिड़िया
जिसने अभी सीखा नहीं था दाना चुगना
तुम दाने के बहाने जाल डालके
उसका आसमान ले गए.
कई रातों तक देखती थी जो ख्वाब
घोनषलॉन से निकल कर एक उड़ान भरने का
उसके पंखों को बाँध कर
तुम उसका वो सारा ख्वाब ले गए.

परमीत सिंह धुरंधर