हर धार को
किनारों से मिलना है।
मिलकर किनारों से
मिटना है।
प्रकृति की यही
एक चाल है।
इसी चाल में फँसकर
सबको पीसना है।
हमको दिल वहीं रमाना है,
जहाँ प्रभु का साया है।
RSD
हर धार को
किनारों से मिलना है।
मिलकर किनारों से
मिटना है।
प्रकृति की यही
एक चाल है।
इसी चाल में फँसकर
सबको पीसना है।
हमको दिल वहीं रमाना है,
जहाँ प्रभु का साया है।
RSD
खोलकर जटा, भोले, छोड़ दो गंगा की धार,
माँ गंगे की गोद में हो, भोले, जीवन का उद्धार।
पाप का नाश हो, भोले, बढ़े पुण्य अपार,
माँ गंगे की गोद में हो, भोले, जीवन का उद्धार।
खोलकर जटा, भोले, छोड़ दो गंगा की धार,
माँ गंगे की गोद में हो, भोले, जीवन का उद्धार।
तप रहे तपस्वी, भोले, जल रहा है संसार,
सृष्टि पर, भोले, बढ़ रहा है भार।
झूमकर, भोले, छोड़ दो गंगा की धार,
अब तो सुन लो, भोले, भगीरथ की गुहार।
खोलकर जटा, भोले, छोड़ दो गंगा की धार,
माँ गंगे की गोद में हो, भोले, जीवन का उद्धार।
हलाहल को बाँधकर, भोले, नीलकंठ बन जाते हो,
डमरू पर अपने जब चाहो, प्रलय को नचाते हो।
फिर ऐसा क्या है, भोले, जो नहीं सुन रहे पुकार?
खोलकर जटा, भोले, ढक दो अब आकाश।
खोलकर जटा, भोले, छोड़ दो गंगा की धार,
माँ गंगे की गोद में हो, भोले, जीवन का उद्धार।
RSD
भोलेनाथ, मेरे भोलेनाथ, मेरे भोलेनाथ, मेरे भोलेनाथ,
मधुर बहुत है, पिता, आपका लगता मुझको नाम।
कानों में अमृत घुल जाए, हों स्वप्न सब साकार,
जब दिख जाते हो मुझको, भोले, झूमते नंदी पे सवार।
भोलेनाथ, मेरे भोलेनाथ, मेरे भोलेनाथ, मेरे नाथ,
और क्या माँगे, भोले, जब बैठे ही हैं तेरे द्वार?
एक बार चखा दो, पिता, अपने हाथों से बस भांग।
जीवन हो जाए पूर्ण, पिता, जो तुम पिला दो भांग।
भोलेनाथ, मेरे भोलेनाथ, मेरे भोलेनाथ, मेरे नाथ,
क्या है अमृत और क्या है विष, जो तेरी गोद में खेला।
मन तो माँगे बस, हाँ भोले, डम-डम डमरू,
और तुम्हारे हाथों से, भोले, बस थोड़ी-सी भांग।
RSD

वक्त ने सभी को वो राह दे दी है,
जहाँ हम न बदले, तो फिर कोई राह न होगी।
इंसान वही है, जो इंसान का रहे,
ये बात न रही, तो दिल से कोई बात न होगी।
नफ़रत की हवाओं में क्या रखा है आखिर,
मोहब्बत न रही तो कोई सौगात न होगी।
चेहरों पे मुस्कानों का मेला तो लगेगा,
पर सच्चे दिलों की कहीं जमात न होगी।
जो दर्द में भी औरों का सहारा बन जाए,
ऐसे इंसानों से फिर मुलाकात न होगी।
रिश्ते अगर मतलब से ही जिए जाएंगे,
तो फिर दिलों में कभी-कोई चाह न होगी।
चलो आज फिर इंसानियत को जगा लें,
की बेटियों की खौफ में रात न होगी।
वक्त ने सभी को वो राह दे दी है,
जहाँ हम न बदले, तो फिर कोई राह न होगी।
Dedicated in memory of the Bhopal Katara Hills incident.

**होता जो शोहरत में ही नशा,
तो मयखाने में टूटे दिल न होते।
मिलता जो सुकून बाहों में,
तो सुकून के लिए ये तलाक न होते।
होता जो वफ़ा में कोई असर,
तो रिश्तों में ये फासले न होते।
जो मिलती मोहब्बत बेखौफ़ होकर,
तो दिल यूँ दर-ब-दर न होते।
जो समझ लेते लोग इश्क़ की जुबां,
तो खामोश ये सिसकते लफ्ज़ न होते।
अगर सच्चा होता हर एक सफर,
तो मोड़ पे यूँ बिछड़ते हम न होते।
जो मिलती हर चाहत पूरी तरह,
तो अधूरी ये दास्तां न होते।
अगर दिलों में बस इज़्ज़त होती,
तो ये टूटे हुए आशियां न होते।
अगर वक्त ही वफ़ा निभा जाता,
तो यादों में यूँ जख्म न होते।
जो मिल जाती हर दुआ मुकम्मल,
तो आँखें ये नम न होते।**
जो अपनी निगाहों से अनदेखा करते हैं हमें,
हम तो उन्हें ही बस देखा करते हैं।
मोहब्बत उस मुकाम पे है मेरी कि बस,
तन्हाई में शहनाई सुना करते हैं।
ख़ामोश लम्हों में उनका नाम लिया करते हैं,
दिल की हर धड़कन को उनसे जोड़ा करते हैं।
वो पास हों या दूर, क्या फ़र्क पड़ता है?
हम तो हर ख़्वाब में उन्हें जिया करते हैं।
रातों की चादर में उनकी यादें सजी रहती हैं,
आँखों में तस्वीर उनकी बसी रहती है।
क़िस्मत से मिले या ना मिले वो कभी,
हम तो हर दुआ में उन्हें माँगा करते हैं।
RSD

लहरों का किनारों से कोई रिश्ता नहीं,
ये मज़बूरी है, कोई इश्क़ की दास्ताँ नहीं।
तुमने घर बसा लिया, बच्चे भी कर लिए,
पर आँखें कह रही हैं—ज़ख्म तुम्हारा भरा नहीं।
आसमान के परिंदे ज़मीन पर बैठे,
दाना चुगते, पंख समेटे,
यहाँ उड़ानों से कभी किसी का पेट भरता नहीं।
हम चले थे साथ कुछ दूर तक,
रास्ते बदल गए, मुक़ाम बिखर गए,
अब कोई नाम मेरे होंठों पे ठहरता नहीं।
लहरों का किनारों से कोई रिश्ता नहीं,
ये मज़बूरी है, कोई इश्क़ की दास्ताँ नहीं।
RSD

मयख़ाने में पी रहा हूँ, देख तेरी तस्वीर को,
लगती है तू ज़िंदगी, पर मिलती कहाँ मज़दूर को?
अँखियाँ तेरी कंटीली, छलती हर राहगीर को,
लगती है तू ज़िंदगी, पर मिलती कहाँ मज़दूर को?
प्यास नज़रों से अधरों तक, अधरों से सीने में उतरती गई,
प्यास मिट जाए कभी—नसीब ऐसा कहाँ मजबूर को?
धुँधले ख़्वाबों में ढूँढता हूँ तेरी ही उस नूर को,
पा न पाया कभी तुझको, जैसे दूरी दस्तूर हो।
रात भर जागता रहता हूँ, तन्हाई के सेज पे,
नींद भी कैसे आएं, जब दर्दे-दिल भरपूर हो।
तू अगर मिल भी जाए तो, क्या मिलेगा फ़क़ीर को?
लगती है तू ज़िंदगी, पर मिलती कहाँ मज़दूर को?
RSD
कब तक रचोगे प्रभु माया-मयी सृष्टि?
कभी तो गढ़ो प्रभु, मिले मन को तृप्ति।
क्षणभंगुर जग में भ्रमित-विस्मित हर दृष्टि,
सत्य ओझल हो रहा, बढ़ती जा रही आसक्ति।
भूख-प्यास के बीच अनवरत उठती लालसा,
बढ़ती जा रही है नित मानव-मन की इच्छा।
कब तक रखोगे प्रभु निर्मल को निर्धन?
कभी तो गढ़ो प्रभु, मिले निर्बल को तृप्ति।
नित नए स्वप्नों में उलझा यह जीवन,
पाकर भी सब कुछ रिक्त है मानव-मन।
धन, वैभव, यश सब माया की ही प्राप्ति,
फिर भी न मिटती अंतर्मन की अतृप्ति।
कब तक रखोगे प्रभु सरल पे ही विपत्ति?
कभी तो गढ़ो प्रभु, मिले सरल को तृप्ति।
न्याय की किरण कब ऊषा बनेगी?
कब संध्या पीड़ित की पीड़ा हरेगी?
हे करुनानिधान, हे नर में नारायण
कभी तो भक्तों की भी ले लो सुधि।
कभी तो गढ़ो अरुणोदय ऐसा, मिले सब को मुक्ति।
कब तक रचोगे प्रभु माया-मयी यह सृष्टि?
कभी तो गढ़ो प्रभु, मिले मन को तृप्ति।
लिख रहा भक्त है, प्रभु तुमको पत्री
कभी तो गढ़ो प्रभु, मिले मन को तृप्ति।
कब तक रचोगे प्रभु माया-मयी यह सृष्टि?
कभी तो गढ़ो प्रभु, मिले मन को तृप्ति।
RSD