अश्क तस्वीर बना देंगें


मुझसे ना पूछ
ए जमाना
मेरे महबूब का नाम.
मेरे अश्क
उसकी तस्वीर बना देंगें।

तुम्हे क्या पड़ी
मेरे दर्द की?
उसका रूप
तुम्हारे दिल में भी
दर्द जगा देंगें।

लौट गए इतने सावन
मेरे दर से
अब बहारें आके भी
क्या कर लेंगी?
जो वो अपना घूँघट उठा देंगें।

Rifle Singh Dhurandhar

तेरे प्यार में वो बबिता


कवि लिख रहा है कविता, तेरे प्यार में वो बबिता।
तू सुनती नहीं तो, दिल जग को सुना रहा.

फिर ऐसा दर्द न, किसी प्रेम को मिले।
जैसा दर्द पा कर, दिल मेरा तड़प रहा.

जब – जब दिल हुआ घायल, मैंने खरीदे थे पायल
दिल सारे पायलों को आज तोड़ रहा.

फिर तन्हाई में कोई जिंदगी ऐसे ना गुजरे।
जैसे दिल ये मेरा तन्हाई में गुजर रहा.

Rifle Singh Dhurandhar

द्रौपदी चुनती है


सूर्य सा भाल, कौन्तेय का रूप
फिर भी धरा पे ना बंधू ना कुटुंब।
अपना ही तेज है, अपना ही बल
फिर भी सभा में, पल-पल,
क्षण-क्षण, अपमान का घूंट।

वीर के धैर्य का ना कर रण में सामना
पूछते हैं सभी केवल उसका वंश-कुल.
किस्मत के सहारे कब -कहाँ?
हुआ है कोई पौरष हाँ उदित।
पर भाग्य का ऐसा भी होता है एक दंश
ह्रदय, शौर्य ठुकराकर
द्रौपदी चुनती है कुरुवंश का दीप.

Rifle Singh Dhurandhar

मेरी चिड़िया


मेरी चिड़िया, चुग ले दाना
छोड़ आसमा, बना ठिकाना।
तेरा है कोई, इस जहाँ में
समझ ले तू भी ये अफ़साना।
प्यासी रातें, तड़पते दिन हैं
संसार यही है, आँगन-चहचहाना।

Rifle Singh Dhurandhar

पिता की ये काया


जुल्फों का तुम्हारे जब घना होगा साया
कहाँ तुम्हे याद होगा पिता की ये काया?
आँखों में शर्म और मुख पे होगी जब चंद्र की छाया
कहाँ तुम्हे याद होगा पिता की ये काया?
दो ही पलों का, बस यह मोह -माया
कहाँ तुम्हे याद होगा पिता की ये काया?

Rifle Singh Dhurandhar

डोर


मैं पुकारता ही रहा
प्रेम में होकर भाव-विभोर।
छोटी-सी इस जिंदगी में
कितनी कमजोर हैं प्रेम की डोर.

तपते रेत पे बारिश की दो-चार ही बूंदे
छोटी-सी इस जिंदगी में
कितनी कमजोर हैं किस्मत की डोर.

Rifle Singh Dhurandhar

फटी-मैली-कुचैली साड़ी में


जो सर्वविदित सत्य है
उसी से सबको इंकार है.
जिसका प्रेम जितना पवित्र है
वो उतना ही लाचार है.
अश्कों में बंधकर भी
जिसका ह्रदय बिशाल है.
फटी-मैली-कुचैली साड़ी में
भी माँ सागर सी अथाह है.

जितना मथ लो, गरल की एक बून्द नहीं
बस प्रेम-ही-प्रेम, आपार है.
मगर मनुष्य को कहाँ
इसका ज्ञान है?
भागता-भागता ही रहा जो
चैन-सुकून की तालाश में
फिर लौटा है, महलों को छोड़कर
टूटी-फूटी-टपकती झोपडी में
जो उसके माँ का निवास है.

Rifle Singh Dhurandhar

End


Tears and dreams
there is no difference at the end of the journey.
Insult and honors
there is no difference at the end of the journey.
The end itself is an honor.
Defeat and win
there is no difference at the end of the journey.
Once you are in a ring, you are a winner.

Rifle Singh dhurandhar

Permanent Effects


With all your sharp features
we have to make a decision.
Where should I keep my eyes
, and where should my lips?

Holding your waist,
my breaths are getting heavy.
Could you not close your eyes while
we are cozy?

With your beauty,
let me be your cloth and feel heavenly.
The night will not be the same again.
Holding you in my arms like a chain
with your hairs on my chest
the life has turned into a birthday cake.

My lips are dry for your lips.
My chest beats in rhythm with your breath.
My eyes do not want to leave the dream.
My breath intends to have only your smell.
Life is like a blessing
when one enjoys his nudity.
I want to have this again and again.
I want to feel your smooth touch every second.

A bite on your thigh and an edge on your breast
taking away your shyness and making you wild.
It’s like thousands of waves of sea falling on me.
No space, no airs between us
it seems waves want to conceal me.

The knot of your saree and the button your blouse
I want to pull them down.
On your soft silky smooth skin
I want to give my marks on every inch
before planting seeds for a new life.

An army man cannot sleep until he finishes his fight.
A farmer cannot rest until the whole field is plowed.
How can I sleep when I see your beauty without my marks?
Nothing is permanent.
Neither your beauty nor my breaths.
Let me work hard to give you permanent effects.

Rifle Singh Dhurandhar