मैं ख़्वाब ढूँढ़ता था जिस छाँव के तले,
वहीं धूप में थे मेरे पाँव हाँ, जले।
एक-एक करके सबने फेर ली नज़र,
फिर भी मैं चल पड़ा था लिए पाँव जले।
राह में बिछे थे कई ख़ामोश काँटे,
हर मोड़ पर थे इम्तिहाँ, लगने को गले।
हवाएँ रूठी थी, घटाएँ भी थीं खफ़ा,
मगर न रोक सके वो, अरमान थे जो पले।
जो साथ थे कभी, वो दूर जा बसे,
हम अपने दर्द के ही हमसफ़र थे बने।
नमी थी आँख में, पर लहू था उबाल पे ,
इरादों के चिराग़ थे कुछ यूँ हाँ, जले।
अब धूप से नहीं कोई गिला ही रहा,
उसी ने रास्तों के हैं मायने बदले।
मैं ख़्वाब ढूँढ़ता था जिस छाँव के तले,
अब ख़ुद ही बन गया हूँ छाँव उन के लिए।
RSD