तुमसे आगे कौन?


तुम्ही वशिष्ठ, तुम्ही नारायण
तुमसे आगे कौन?
वृहस्पति का आशीष तुम्हे
फिर तुमसे आगे कौन?
धरा भी विचलित हो जाती थी
जब अँगुलियों में कलम खेलती थी
अब जाने गलत हो जाए प्रमेय कौन?

बाल – क्रीड़ा में, साइंस -कॉलेज में
एक से एक उदण्ड
उनमे तुम प्रखर ऐसे
जैसे अम्बर पे मार्तण्ड।
तुमसे मिल कर केली भी ऐसे
विस्मित -वशीभूत
की ज्ञान के इस सागर का
मोल लगाए कौन?
ऐसे ही लाल से, माँ होती है धन्य
अब कहाँ, किसपे ममता लुटाये कौन?

My tribute to the great mathematician of Bihar late Vashishtha Narayan Singh.

परमीत सिंह धुरंधर

बबुनी तनी धीरे


बबुनी तनी धीरे
बबुनी तनी धीरे।
तहरा पे नजरिया लागल बा
तहरे से उमरिया बाझल बा.
तहरा उम्र में हम तितली रहनी
अरे अंगना -दुआर
खेत -बथान
सगरो एक ही टांग
पे नाचत रहनी।
अब त उमरिया ढलल बा
अब त देहिया नवल बा.
बबुनी तनी धीरे
बबुनी तनी धीरे।

तहरा पे नजरिया लागल बा
तहरे से उमरिया बाझल बा.
सूरज के उगला से पाहिले
अपना सास के बोलला से पाहिले
चौका -चुहानी, नाद-खलिहानी
चिकन कर के
रोटी तोड़नी।
की अब त
ना उ सकान बा
ना अब उ उड़ान बा.
बबुनी तनी धीरे
बबुनी तनी धीरे।

तहरा खातिर मागेम
दूल्हा सुन्दर
शिव के दुअरिया
आचार फैला के.
तहरे ललनवा खेला
के जाएम
यह माया -मोह छोड़ के.
अब त सोना भी भारी लागत बा
अब त तोता भी उड़ेल चाहत बा.
बबुनी तनी धीरे
बबुनी तनी धीरे।

परमीत सिंह धुरंधर

नवयौवना


दिल समझेगा तेरा जिस दिन मुझको
उस रात तू मेरी बाहों में होगी
अरे बन के नवयौवना तू
सेज पे मेरे फिर पिघलेगी।

परमीत सिंह धुरंधर

मौक़ा मिले


कुछ आपके करीब से गुजरने का मौक़ा मिले
कुछ आपके पहलु में ठहरने का मौक़ा मिले
कभी निगाहों, कभी बाहों
कभी आपकी जुल्फों से खेलने का कोई मौक़ा मिले
ठहर जाए जिंदगी वो पल बनकर
जिस पल में तुझे अपना कहने का मौक़ा मिले।

परमीत सिंह धुरंधर

घुलने को मदिरा बनके


बारिश की बूंदें भी तड़प उठती है तन पे गिर के
ना चमको मेघों में तुम बिजली से छुप के
उतर आवो बाहों में
नशों में घुलने को मदिरा बनके
कब तक चमकेगी मेघों के बीच यूँ बिजली बनके
उतर आवो बाहों में
नशों में घुलने को मदिरा बनके।

परमीत सिंह धुरंधर


रोजे खेला खेलेली संगे हमरा नन्दो
चिठ्ठी पठावे ली रोजे यार के
लिफाफा पे हमार नाम लिख के.

रोजे खेला खेलेली संगे हमारा सासु
रोजे दबवा के कमरिया
कोहरे ली ससुर के आगे खाट पे.

परमीत सिंह धुरंधर