क्या पालोगे धुरंधर?


जब दिल टुटा था, संभालना मुश्किल था
अब संभल गया हूँ, तो फिर टूटना मुश्किल है.

इस जमाने की भी क्या खूबी है?
की इसमें बेवफा को, बेवफा ही कहना मुश्किल है.

जो करते हैं वादे हर घड़ी प्यार -मोहब्बत के
उनका किसी पल भी, वादों पे टिकना मुश्किल है.

हया सारी निगाहों की उनकी है झूठी
की इस समंदर में किसी का भी टिकना मुश्किल है.

क्या पालोगे धुरंधर उनके आगोश में जाकर?
जिनके काँधे पे आँचल का भी टिकना मुश्किल है.

Rifle Singh Dhurandhar

ताउम्र


ताउम्र प्यार की आरजू रही.
ताउम्र वो ख़्वाबों में आती रहीं।
ताउम्र सीने में एक बेचैनी सी रही
ताउम्र वो छज्जे से मुस्कराती रहीं।

ताउम्र मैं दौलत कमाता रहा
ताउम्र झोली मेरी खाली रही.
ताउम्र मेरे हौसले टूटते रहे
ताउम्र माँ मेरी, हौसले बढाती रही.

Rifle Singh Dhurandhar

पेंच होता है


प्रेम होता है जिस्म से और दिल रोता है
नजर के खेल में बस ये ही पेंच होता है.

रोकने से रुक जाए ये मुमकिन नहीं
बेवफाओ का बस ये ही अंदाज होता है.

Rifle Singh Dhurandhar

ये जो इल्म होता


दर्द में मैं नहीं तू भी है साकी
ये जो इल्म होता तो तुझे बेवफा ना कहते।

होते हैं रंगबाज सभी छपरइया
ये जो इल्म होता तो हमसे ना टकराते।

जूनून आज भी है मुझे बुढ़ापे में
ये जो इल्म होता तो वो घूँघट ना उठाते।

शौक कई पाल रखे हैं दिल में
ये जो इल्म होता तो वो ना मुस्कुराते।

Rifle Singh Dhurandhar

मीर-ग़ालिब को ये जो इल्म होता


ये मस्तियाँ जो रह गयीं ख़्वाबों के नीचे
ये जो इल्म होता तो हम बगीचे में सो लेते।

इश्क का नशा, हैं बस दर्द से भरा
ये जो इल्म होता तो हम यूँ कैद ना होते।

जुल्फ की छावं भी हैं काँटों से भरी
ये जो इल्म होता तो हम आगोस में ना आते.

सारे जहाँ के हुस्न का एक ही रंग है बेवफाई
मीर-ग़ालिब को ये जो इल्म होता तो हम ना कहते।

Rifle Singh Dhurandhar

तो कोई बात है


दुआ की हर रात अधूरी हो, कोई बात नहीं
बाहों में हर रात अधूरी हो, तो कोई बात है.

मौत जहर से हो तो कोई बात नहीं
मौत नजर से हो तो कोई बात है.

वो शहर में सभी की है, तो कोई बात नहीं
वो शहर सिर्फ तुम्हारी हैं तो कोई बात हैं.

Rifle Singh Dhurandhar

ये इल्म होना चाहिए


सभी को अपनी सरहदों का, इल्म होना चाहिए
इश्क़ हो ना हो, मगर ये इल्म होना चाहिए।

लुटते हैं सभी इसमें बस एक नजर से
खंजर चलता नहीं यहाँ, ये इल्म होना चाहिए।

गुस्ताखियाँ कब तक करोगे, अपने माता-पिता से
रिश्ता ऐसा कोई और नहीं, ये इल्म होना चाहिए।

पर्दानशी हो वो या बे-पर्दा, हुक्म उन्ही का चलता है
इस सौदा में नफ़ा नहीं कभी, ये इल्म होना चाहिए।

सितम की रात होगी अभी और, ये अंदेसा है हमें
सितमगर कोई अपना भी होगा, ये इल्म होना चाहिए।

रुखसार पे उनके लाली, ये भी एक सजा है
जो चूमे उसे, उसको भी ये इल्म होना चाहिए।

नफरत की इस दुनिया में मोहब्बत की तलाश में
तन्हाई के सिवा कुछ नहीं, ये इल्म होना चाहिए।

इस दर्दे-दिल को लेकर ही जीना है हमें
हर दर्द की दवा नहीं, ये इल्म होना चाहिए।

हथेलियों की रेखा कहती है की हर साल शहनाई है
कुछ मिले, ये लाजमी तो नहीं, ये इल्म होना चाहिए।

Rifle Singh Dhurandhar