बिजली बन गयी है


तू अब ऐसी हसीं बन गयी है
की किसी की जमीन बन गयी है
बादल बरसे भी तो अब कहाँ
तू उनमे छुपी बिजली बन गयी है.

जेठ की दोपहरी में बरगद की छाया
तू वही ठंडी छाँह बन गयी है.
प्यास से दहकते अधरों के लिए
शीतल, सरिता बन गयी है.
आईने भी दरक रहे हैं तेरे कटाव पे

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A Finite Preference


I want to fall under gravity
the way the apple did—
silent, certain,
obedient to a law it never questioned.

Not to drift like infinity,
endless and unresolved,
stretching beyond measure,
never arriving.

Infinity never grows,
never diminishes—
it only refuses to end.

I would rather be zero:
a point of rest,
a place where motion begins,
where something can be counted,
where change is possible.

Let me fall.
Let me touch ground.

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समंदर


मिला जो समंदर, वो बेचैन बहुत था
मैं अविवाहित और वो तन्हा बहुत था.
हजारों दरियाएँ बाहों में सिमटी
मगर रूह में उसके प्यास बहुत था.
मिला जो समंदर, वो बेचैन बहुत था
मैं अविवाहित और उसमे दर्द बहुत था.

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दीप जला के


धुप में बैठा हूँ दीप जला के
यही मेरे इश्क़ की कहानी है.
हो गए उसके, अब तो चार-चार बच्चे
फिर भी मुझको वो लगती कुवारी है.

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The Nagercoil Express


The Nagercoil Express was running at full speed.
Our gang—including me—waited at Pune Junction,
holding onto a single belief.

As the train stopped, we ran along the platform,
my friends by my side,
trying to help me find her
without a photo, without a clue.
None of them had seen her before,
but together we searched,
while I alone knew her face.

Suddenly, I heard a scream—my name.
There she was, her face glowing,
her mother standing beside her, surprised.

She introduced me,
and I saw her mother ignite with emotion.
Her daughter shimmered with worth,
proving herself in her mother’s eyes,
while her mother silently weighed what to do next.

The train gained momentum.
She whispered for me to step down.
On the platform, I felt as though I could rule life with her as queen.
I felt like a maharana victorious at Haldighati,
winning unexpectedly,
for the real challenge had been finding her
without a date, a reservation, or even the train’s name.

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माया


सब है माया, माया का खेल ही तो रचने आए है.
दो नैना तेरे ए नारी, बस मर्द को छलने आए हैं.
जो हैं बाहों में उनका भी क़त्ल होगा कल,
बस हम बाहों में आने से पहले ही मारे गए हैं.
जिनको यकीन है की ये मेरी, बस मेरी ही बन गयी
इसी यकीन से कितने पहले यहाँ सुलाए गए हैं.

बादल बरसते नहीं है,
बिजलियाँ उन्हें बेचैन कर देतीं हैं
रोने के लिए.
आदमी घर बसता नहीं है
औरत मजबूर कर देती हैं
चारदीवारी में ताउम्र रहने के लिए.

धुप में जितने छावं भी नहीं
उतने उसके पाँव है हसीं।

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कू-ए-यार में


किसकी मोहब्बत सजी है नसीब की राह में,
यार ज़मीन भी दे, जिस्म भी दे—तो क्या?
बेवफ़ाई ही तो रहती है कू-ए-यार में।

दिल ने तलाश की थी सुकूँ उसकी आगोस में,
घाव ही घाव मिले हमको कू-ए-यार में।

हमने भी चाहा था उम्र गुजरे उसकी बांह में,
नाम तक ना रहा अपना अब कू-ए-यार में।

रातें गुज़र गईं उसकी चाह की याद में,
ख़्वाब टूटते रहे चुपके चुपके हिसार में।

जिस्म और जाँ भी मिले हों तो क्या हुआ ऐ दिल,
वफ़ा कभी नहीं मिलती कू-ए-यार में।

हम तो खुश थे उसके झूठे इकरार में,
अब नाम भी कोई याद करता नहीं कू-ए-यार में।

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Inspired by the Sher, “कितना है बद-नसीब ‘ज़फ़र’ दफ़्न के लिए
दो गज़ ज़मीन भी न मिली कू-ए-यार में”, this is my reply to it.

बहनों का सम्मान हो


बहनों का सम्मान हो
ऐसा एक बिहार हो,
बस शब्दों से बखान नहीं
कर्म भी उस अनुसार हो.

गोद में खेलाया है
हांथों से खिलाया है
चुम-चुम के गालों को
रोते से हंसाया है.
आंसू भी निकले तो
भाइयों के आँख हो.
बहनों का सम्मान हो
ऐसा एक बिहार हो,
बस शब्दों से बखान नहीं
कर्म भी उस अनुसार हो.

पकड़कर उँगलियों को
स्लेट पे लिखना सिखाया है
भारी हमारे बस्तों को जिसने
कांधों पे अपने उठाया है.
मायके के आँगन पे बस
उनका ही अधिकार हो.
बहनों का सम्मान हो
ऐसा एक बिहार हो,
बस शब्दों से बखान नहीं
कर्म भी उस अनुसार हो.

पूर्वज थे एक हमारे जो सब कुछ
अपना मिटटी पे लुटा गए.
ये क्या वक्त आ गया है की
हम अपनी बहनों की भुलाने लगे.
हर तिजोरी, ताले की चाबी
बस अपनी बहनों के हाथ हो.
बहनों का सम्मान हो
ऐसा एक बिहार हो,
बस शब्दों से बखान नहीं
कर्म भी उस अनुसार हो.

तोमरों का लहू अब भी जिन्दा है जमीं
जिसका कोई नहीं, उसके हम हैं भाई.
बस राखी के ही दिन नहीं
सालों भर मायके पे अधिकार हो.
बहनों के क़दमों में निसार,
जन्नत, ताज और संसार हो.
बहनों का सम्मान हो
ऐसा एक बिहार हो,
बस शब्दों से बखान नहीं
कर्म भी उस अनुसार हो.

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दम्भ है वीरों का


टूट कर भी तारे अम्बर के जमीन पे आते नहीं
ये ही दम्भ है वीरों का, वो हार से शर्माते नहीं।

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ये उम्मीदें तुमसे मिलन की


घड़ी -की-घड़ी रह गयी
ये उम्मीदें तुमसे मिलन की.
छोटी -से छोटी होती जा रहीं
ये आसमा और ये जमीन
पर, दूरी – की – दूरी रह गयी
ये उम्मीदें तुमसे मिलन की.

सोचा था की पटना से एक पल बांधूंगा
चलेंगे नंगे पाँव जिसपे हम और तुम.
ये लकीरे लिखी – की -लिखी रह गयी
ये उम्मीदें तुमसे मिलन की.
घड़ी -की-घड़ी रह गयी
ये उम्मीदें तुमसे मिलन की.

अब नहीं है इरादा
नहीं है जूठी ही आशा
टूटी-की-टूटी रह गयी
ये उम्मीदें तुमसे मिलन की.
घड़ी -की-घड़ी रह गयी
ये उम्मीदें तुमसे मिलन की

मिलता भी कोई तो कैसे?
हमने दिल में बसाया है तुमको
उजड़ी-की-उजड़ी रह गयी
ये उम्मीदें तुमसे मिलन की.
घड़ी -की-घड़ी रह गयी
ये उम्मीदें तुमसे मिलन की.

RSD