वो भी क्या दिन थे?


वो भी क्या दिन थे?
पिता के साथ में
हम थे हाँ लाडले
आँखों के ख्वाब थे.

जो भी माँग लिया
वो ही था मिल जाता
वो थे आसमान
और हम चाँद थे.

भाग्या प्रबल था
और हम भी प्रबल थे
वो कृष्णा थे हमारे
हम प्रखर थे उनके छाँव में.

Rifle Singh Dhurandhar

बहुत याद आते हो पिता


बहुत याद आते हो पिता
इस समंदर में.
ये युद्ध है सत्ता का
ये सुख है सत्ता का
सब अधूरा है इस आँचल में.

अम्बर तक पंख पसारे
उड़ता हूँ.
फिर भी एक सूनापन है
इस जीवन में.

मौत का वरन मुस्करा कर
कर लेंगें
अगर उस तरह आप मिलोगे।
प्रेम है तो बस पिता के आलिंगन में.

Rifle Singh Dhurandhar

Father and Ex


I missed my father
More than my ex
As that was the best father-son pair
That was selected by Nature.

My ex and I
Were just a choice made by us
And we were still looking
To find the best.

The love between my father and me
Was blind
Without any expectation
Full of appreciation and enjoyment.

The love with my ex
Was a force, which strength was
Proportional to my success rate
But my success rate was inversely proportional
To the availability of another successful man.

Rifle Singh Dhurandhar

पिता और मेरा प्रेम


पिता और मेरा प्रेम
जैसे गंगा की लहरों पे
उषा की किरणें
और प्रकृति मुस्करा उठी.

हर्षित पिता मेरी उदंडता पे
उन्मादित मैं उनकी ख्याति पे
पिता -पुत्र की इस जोड़ी पे
प्रकृति विस्मित हो उठी.

अभी जवानी चढ़ी ही थी
अभी मैं उनके रथ पे चढ़ा ही था
की प्रकृति ने
विछोह की घड़ी ला दी.

Rifle Singh Dhurandhar

छापरहिया एक बादल


मेरे मुख का दर्प ये ही हैं
ये ही हैं मेरे सागर।
पाकार इनसे जीवन-अमृत
हुआ मैं दम्भ में पागल।

अट्टहास लगाता जीवन में हूँ
की कोई छीन नहीं सकता मेरे ये आनंद।
सुशीला- धुरंधर का लाल मैं
फीका जिसके आगे स्वर्ग, मेनका का आंचल।

उसपे मैं तोमर राजपूत
और छापरहिया एक बादल।
जहां पे मैं ठहर जाऊं
वहीँ पे बरसे सावन।

The poem is written for my father and mother. It is the best blessing I have in my life.

Parmit Singh Dhurandhar

श्री गणेश और मूषक


पिता और मैं, जैसे
सुबह की लालिमा
और चाँद की शीतलता
दोनों एक साथ
जिसका स्वागत करते
पक्षीगण कलरव गान से.

पिता और मैं
सुसुप्त अवस्था में
जैसे कोई ज्वालामुखी
और बहुत अंदर उसके सीने में
कहीं आग सा धड़कता मैं.

पिता और मैं, जैसे
छपरा का कोई धुरंधर
त्यागकर अपनी चतुराई
और चतुरंगी सेना
बना मेरा सारथि
और कुरुक्षेत्र में उतरता
नायक बन कर मैं.

पिता और मैं, जैसे
शिव और भुजंग
पिता और मैं, जैसे
हरी और सुदर्शन
पिता और मैं, जैसे
सूर्य और अम्बर
पिता और मैं, जैसे
श्री गणेश और मूषक।

परमीत सिंह धुरंधर

प्रेम हो तो पिता सा – 2


प्रेम हो तो पिता सा
गोर मुख पे काले तिल सा.
हम सोंचे ये रूप है मेरा
ये यौवन है मेरा
मगर जमाना जानता है
की ये कमाल है इस तिल का.

हवाओं ने रुख बदले
सितारों ने चाल बदले
यौवन के ज्वार में रिश्ते
और रिश्तेदार बदले
मगर वो अटल है अम्बर पे ध्रुव सा.

परमीत सिंह धुरंधर

प्रेम हो तो पिता सा


प्रेम हो तो पिता सा
अदृश्य, मगर अचल पर्वत सा.
धुप में छाँव सा
रहश्यमयी ब्रह्माण्ड में
अचल-अनंत ब्राह्मण सा.
जीवन – रूपी गरल का पान
स्वयं निरंतर करते हुए
अमृत – कलश हमारे अधरों पे
रखता, अवचलित
मौन, सन्यासी, शिव सा.

परमीत सिंह धुरंधर

जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय क्या है?


हमसे बोलो
तुम्हे क्या चाहिए?
तुम पुत्र मेरे हो
तुम्हे ला के हम देंगें।
जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय क्या है?
पुत्र तुम्हारे लिए
काल से भी हम टकरायेंगे।

पाकर तुम्हे प्रफुलित मन है
विराट होने का यही क्षण है
नस – नस में तुम्हारे
लहू है मेरा
नस – नस को तुम्हारे तृप्त करेंगे।
जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय क्या है?
पुत्र तुम्हारे लिए
काल से भी हम टकरायेंगे।

अधूरा है आनंद का हर एक पल
जो मुस्कान न हो तुम्हारे मुख पे
चल कर खुद काँटों पे
पुत्र तुम्हारे लिए
हम हर पुष्प खिलायेंगे।
जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय क्या है?
पुत्र तुम्हारे लिए
काल से भी हम टकरायेंगे।

धुरंधर – सुशीला के
लाल हो तुम
तुम्हें यूँ तो व्याकुल
नहीं देख पायेंगे।
जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय क्या है?
पुत्र तुम्हारे लिए
काल से भी हम टकरायेंगे।

भीषण होगा युद्ध
और वृद्ध हम होंगे
तब भी समर में
पुत्र तुम्हे
अकेला तो नहीं भेजेंगे।
जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय क्या है?
पुत्र तुम्हारे लिए
काल से भी हम टकरायेंगे।

प्रिये हो तुम पुत्र, अति हमें
ये प्यार किसी और को
तो हम फिर ना दे पायेंगे।
जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय क्या है?
पुत्र तुम्हारे लिए
काल से भी हम टकरायेंगे।

In the memory of my father Dhurandhar Singh.

परमीत सिंह धुरंधर

मोहब्बत का समंदर


मेरी मोहब्बत का समंदर
बस पिता के नाम से आरम्भ
और पिता के नाम पे
जिसका अंत होता है.
जैसे सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में
अनंत तक शिव, शिव
और बस शिव का नाम होता है.

परमीत सिंह धुरंधर