Every night


Every night I see the moon and the stars
Every night I feel how much far you are
Every night I draw your smile on the paper
Every night I feel it is not as perfect as you are.

My heart, my blood, they need you
My dreams, my desires, they need you
Every night I keep a pillow
Imagining you are in my arms
Every night I feel it is not as perfect as you are.

I can kiss anyone, I can hold anyone
But nothing is as perfect as you are
We live across the road
But every second I feel how much far you are.

Parmit Singh Dhurandhar

केजरी – ममता – और माया: a triangle


तुमने ऐसा प्यासा छोड़ा
नासूर बन गया फोड़ा
अब तो ये प्यास मिटती नहीं
चाहे जितना भी पिलाती मेडोना।

तेरी आँखों का जादू
लूट ले गया मेरा पूरा काबुल
पतली कमर तूने हिला के
ऐसे मारा दिल पे हथोड़ा।

सब कहते हैं मैं हूँ पागल
तूने ऐसे छनकाया अपना छागल
डोली चढ़ गयी किसी और के
मुझको खिला के गरम पकोड़ा।

सत्ता में हैं मोदी
यूपी को संभाले योगी
मुझको तूने ऐसे नचाया
जनता को नचाये जैसे
केजरी – ममता – और माया।

God is here


Let’s live together
To achieve something better
You are not alone
Don’t keep any fear
Because God is here.

God is here
To protect your smile
And make you happy
He is sending His blessing
Through the sun and the moon
Through the snow and the air
As God is here.

You call Him Jesus
For me, He is Rama
He is within you
He lives in my heart too
The whole world belongs to him
And we are just His flavors
So God is here.

Nothing can stop you
Until you give up
He has all plans for your success
He is always in your side
So don’t ask for any favor
God is here.

Parmit Singh Dhurandhar

बरसे भी तो जलती ही आग है


कण – कण में व्याप्त है
फिर भी अपर्याप्त है
लालसा है मन की
या लिखित बेचैन ही भाग्य है.
अंत नहीं भूख का
जहाँ मौत भी एक प्यास है.
आँखों के काजल सा
बिजुरी में बादल सा
बरसे भी तो हाँ, जलती ही आग है.
दिखता नहीं
निकलता नहीं
छुपता नहीं, फिर भी
रौशनी के मध्य
एक अदृश्य – अन्धकार है.

नयनों के खेल सा सा
दिलों के मेल सा
जो तोड़े न मन को
जो जोड़े ना तन को
जिससे मिलन को
हर पल उठती हाँ टिस है
मधुर मिलन पे फिर
लगती भी ठेस है.
ऐसी है वासना
फिर भी है छोटी
आगे उसके
ऐसा अनंत तक उसका विस्तार है.

बांधों तो वो बांधता नहीं है
साधो तो वो सधता नहीं है
कालचक्र से भी परे है वो
काल से भी वो मिटता नहीं है.
सृष्टि उसके बिना अपंग – अपूर्ण है
और उसके संग सृष्टि, नग्न – न्यून है.
है मिश्री के मिठास सा
अंगों पे श्रृंगार सा
नारी जिसके बिना सुखी एक डाल है.
और यौवन जिसके बिना हाँ बस एक लास है.

परमीत सिंह धुरंधर