भज गोविन्दम


भज गोविन्दम, भज गोविन्दम,
भज गोविन्दम रे.
मन की पीड़ा, तन का कष्ट
सब प्रभु हजार लेंगे।

भज गोविन्दम, भज गोविन्दम,
भज गोविन्दम रे.
ना कोई माया है, ना कोई है छल
निमल मन से पुकार लो
प्रभु दौड़े आएंगे।
भज गोविन्दम, भज गोविन्दम,
भज गोविन्दम रे.

चार पहर के मल्ल युद्ध में
जब ग्राह ने छल किया।
भक्त की पीड़ा पे श्रीहरि दौड़े
ना क्षण भर का विश्राम किया।
बस नयनों में नीर को भर लो
प्रभु दौड़े आएंगे।
भज गोविन्दम, भज गोविन्दम,
भज गोविन्दम रे.

मैं तो सुनती तुम्हारी मुरली हूँ


दीप जलाती हूँ, गोविन्द।
पुष्प चढाती हूँ, गोविन्द।
कुछ नहीं मांगती हूँ,
बस दिल लगाती हूँ गोविन्द.
जग समझे तुम्हे मूरत माटी की,
मैं तो सुनती तुम्हारी मुरली हूँ-२.

गीत गाती हूँ गोविन्द,
गुनगुनाती हूँ, गोविन्द
थिरकती हूँ, नाचती हूँ गोविन्द।
जग समझे मीरा, मति हारी
मैं तो सुनती तुम्हारी मुरली हूँ-२.

कैसे रोकूं खुद को तुमसे?
कहाँ कोई दुरी रह गई हम में?
जग समझे मीरा हो गई बावरी
मैं तो सुनती तुम्हारी मुरली हूँ -२.

मेरे मन-ह्रदय से गोविन्द


कब तक छुपोगे इन आँखों से?
कब तक छुप-छुप के रहोगे?
कैसे छुपोगे मेरे मन-ह्रदय से गोविन्द?
कैसे छुपोगे मेरी साँसों से गोविन्द?

Rifle Singh Dhurandhar

ए मोहन।


कुछ भी नहीं धरा पे मनभावन
कुछ भी नहीं मोहक
तुम्हारे बिना ए मोहन।
फिर किस तरफ मैं जाऊं
छोड़ तुम्हारे चरण, ए मोहन।

Rifle Singh Dhurandhar

तुम कहीं पत्थर ना हो जाओ


कब तक दिल को बाँधोगे
कहीं सुख न जाए अश्क इन आखों से.
मैं तो प्यासी रह जाउंगी,
तुम कहीं पत्थर ना हो जाओ माटी से.
और क्या माँगा हैं एक दर्शन के सिवा?
कब तक ठुकराओगे, कहीं कंठ ना रुंध जाए.
मैं तो प्यासी रह जाउंगी
तुम कहीं पत्थर ना हो जाओ माटी से.

Rifle SIngh DHurandhar

बताओ गोविन्द।


कौन से मन से पुकारूँ तुम्हे?
बताओ गोविन्द।
जिसमे पीड़ा है, या जिसे तुमसे बाँधा है.
कौन से नयना से निहारूं तुम्हे?
बताओ गोविन्द।
जिसमे अश्क हैं या जिन्हें तुमसे लड़ाया है.
कैसे खुद को सजाऊँ?
बताओ गोविन्द।
चुनर-चूड़ी, जेवर से, या जो पुष्प तुमपे चढ़ाया है.
किस रंग को चढ़ा दूँ चुनर पे अपने?
बताओ गोविन्द।
जो ज़माने ने दिया मुझे, या जो तुमने मुझे लगाया है.

Riffle Singh Dhurandhar

क्यों नहीं?


हो गए एक तुम सारे जग के
फिर मेरे ही तुम क्यों नहीं?
हर रंग है तुम्ही से जग में
फिर मैं ही रंगी क्यों नहीं?
हर रस में हो तुम, हैं तुम्ही से पराग
फिर मिली मुझे ये मिठास क्यों नहीं?
पनपा हर जीवन तेरे सांचे पे
तेरी उँगलियों ने तरसा इन्हें
फिर मुझमे ही तेरी वो छुअन क्यों नहीं?
भज के एक तेरा नाम सभी
हो जाते हैं भाव सागर पार
एक मेरी ही बेड़ियाँ अभी तक टूटी क्यों नहीं?
राधा-रुक्मिणी, जामवंती, सभी को मिला तेरा साथ
फिर एक मीरा के आँचल में ही तू क्यों नहीं?

Rifle Singh Dhurandhar

मीरा के मोहन


तुम्हारी नजर के हैं दीवाने सभी,
मेरी हर नजर में तुम्हीं हो तुम्हीं।
रुस्वा करो, तनहा रखो,
शिकवा कोई, कभी ना, कहीं।
अब इस जिंदगी में बस तुम्हीं हो तुम्हीं।
धूल में रहूँ, काँटों में रहूँ,
मुस्कराती रहूंगी, बस अपने चरण में रखो.
इस मीरा के अब मोहन तुम्हीं, तुम्हीं हो तुम्हीं।
एक विष सा है, ये सम्पूर्ण जीवन मेरा,
बनके प्रभु, अब इसकी लाज रखो.
हर अग्नि-परीक्षा, हंस कर दे दूंगी,
आजीवन, बस, तुम मेरे, केवल मेरे ही रहो.
की इस अबला सीता के,
अब राम बस, तुम्हीं हो तुम्हीं।

 

परमीत सिंह धुरंधर

मीरा


मुझे श्याम ऐसा मिला,
मैं राम भूल गयी.
मन तो मेरा सीता सा,
पर तन से मीरा बन गयी.
धागों के रिश्ते नहीं बाँध सके,
मेरे पावों को.
मैं हर रिश्ता छोड़ के,
जोगन बन गयी.

परमीत सिंह धुरंधर

मीरा


कहाँ मेरे कान्हा,
कहाँ हो कन्हैया,
प्यासी मेरी धरती,
प्यासी हैं मीरा।
गैयन के संग,
मैं भी,
उदाश हूँ खड़ी।
सुनी इस बगिया में,
कहाँ हैं बंसी तेरी।
कहाँ मेरे बंधू,
कहाँ हो कन्हैया,
प्यासी मेरी धरती,
प्यासी हैं मीरा।
चादर भी तन से,
गिरा के मैं हूँ आयी,
पयाल भी पथ में,
कही टूट गयी मेरी।
कांटो से छलनी,
है पग मेरे,
फिर भी आँखों में,
प्रेम छलकाती हूँ आयी।
कहाँ मेरे सखा,
कहाँ हो रचैया,
प्यासी मेरी धरती,
प्यासी हैं मीरा।
दो पल जरा नैनों,
से मेरे पी लो,
दो पल जरा,
बंसी तो बजा दो.
लोक-लाज, शर्म-भय,
सब।
बहती गंगा में,
बहा के हूँ आयी.
कहाँ मेरे प्रेमी,
कहाँ हो रसैया,परमीत
प्यासी मेरी धरती,
प्यासी हैं मीरा।