मैं समर में महाकाल हूँ


मैं आर्यावर्त की शान हूँ
मैं सनातन की पहचान हूँ
मेरी आँखों की निकाल लो
जिव्हा को काट दो
ना मैं झुक सकता हूँ
ना मैं मिट ही सकता हूँ
क्यों की मैं तन- से-मन तक
आदि – से – अनंत तक
शुन्य – से – व्रह्माण्ड तक
मैं चौहान हूँ.
सत्रह बार तुम्हे छोड़ा है
मौत का भय मुझे क्या
जब मैंने तुम्हे जीवन दिया है
धरती से गगन तक
थलचर से नभचर तक
सूर्य से चंद्र तक
मैं समर में महाकाल हूँ.
मैं चौहान हूँ.

परमीत सिंह धुरंधर