मीठी नींद


पिता,
इसलिए नहीं की,
कोई गोद नहीं है,
मैं रोता हूँ.
पिता,
इसलिए भी नहीं,
की खाने पे कोई,
साथ नहीं है,
मैं रोता हूँ.
और,
इसलिए भी नहीं की,
कोई रहनुमा नहीं है,
मैं रोता हूँ.
बल्कि,
इसलिए रोता हूँ,
की अब वो नजर नहीं,
जो मुझमे एक अच्छाई,
ढूंढ सके.
वो जिगर नहीं,
जो हमारी नजर को,
पढ़ सके.
वो दर नहीं,
जहाँ मैं दो घडी,
चैन पाने के लिए,
आँखे बंद कर सकूँ, परमीत।

दिल्ली में बिल्ली


दिल्ली शहर में मेरी बिल्ली भी भाग गयी,
ऐसी भागी वैसी भागी दुनिया पूरी जान गयी.
मैंने खिलाया उसे भर पेट दूध-भात,
खुद ही काटी खली पेट जारी की रात.
पर वो भी निकली कमबख्त बदजात,
मुझ गरीब आशिक को ही लात मार गयी.
दिल्ली शहर में मेरी बिल्ली भी भाग गयी,
ऐसी भागी वैसी भागी दुनिया पूरी जान गयी.
कितना हम में था प्यार भरा,
कितनी रातों को हमने साथ काटा.
देख के एक मोटा-ताजा बिलाड़,
सब कुछ एक पल में सब भुला गयी,
मुझ गरीब आशिक़ पे ही आँखे अपनी तान गयी.
दिल्ली शहर में मेरी बिल्ली भी भाग गयी,
ऐसी भागी वैसी भागी दुनिया पूरी जान गयी.

 

परमीत सिंह धुरंधर

बेवफा


प्यार बिकता है इतना भी,
मैंने जाना न था हाँ कभी,
वो साड़ी में थीं मेरे,
पहने पायल किसी और की.
जिनकी तस्वीर सजाता था,
दीवारों पे अपने,
वो बाहों में थी मेरे, परमीत
सपने सजायें किसी और की.

दाग


दरिया जैसी उछलने लगी मैं,
परमीत ज्यों-ज्यों ये रात ढली,
अब चाँद से कैसे नजरे मिलाऊँ,
जब अपने दामन में ही दाग लगा बैठी।

प्रथम- मिलन और त्याग


तन से गिरा दिया है आँचल,
अब, मन से ना गिराइये।
त्याग मेरा और मेरे तन का,
मुझको स्वीकार है,
पर अपने मन से ना निकालिये।
बुझ दूंगी मैं अपने रूप लावण्या,
के इस जलते अंगार को,
पर आप किसी और के रूप,
को न निहारिये, परमीत।

मैं ही अर्जुन हूँ


ना मैं देवो को मैं मानता,
ना मैं गुरुवों को जानता,
मैं रणभूमि तक आ गया हूँ,
बस पिता को ही मैं पूजता,
तो,
करों सामना मेरी तीरों का,
की मैं ही अर्जुन हूँ.
ना तन को देखो, ना कद को,
की नशों में दौड़ता,
मैं वो ही ख़ून हूँ.
माँ के गर्भ में ही,
पढ़ लिया था पाठ,
मैने अपने पिता से.
करों सामना मेरे बल का,
मैं ही श्वेतवाहन हूँ.
न उत्तरा का हूँ मैं,
ना मैं सुभद्रा का,
ना ही मैं हूँ कृष्णा का,
ना मैं बलराम का,
नाता मेरा बस एक ही है,
परमीत, की मैं ही अर्जुन हूँ,
हाँ, मैं ही अर्जुन हूँ.

परमीत और पराजय


ठोकर खायी मोहब्बत में जिस दिन,
मुझको भी नारी का ज्ञान हुआ,
अभिमान था मुझे अपने योवन पे,
पर मैं भी भीष्म सा पराजित हुआ.
लेकर जिनको बाहों के घेरे में,
मैं इतराता रहता था,
जब चौरस खेली उनके नाम की,
तो मैं भी युधिष्ठिर सा पराजित हुआ.
मैंने उखड़ा है कितने ही सर्पो के,
जबड़े से उनके दांतों को,
मगर बात आई जब मेरे जीवन की,
तो परमीत,
मैं भी परीक्षित सा पराजित हुआ.

माँ


अंगों से खेला हूँ,
रंगों से खेला हूँ,
पर आज भी तरसता हूँ,
माँ के लिए.
जुल्फों में सोया हूँ,
बाँहों में सोया हूँ,
पर आज भी बिलखता हूँ,
माँ के लिए.
ओठों को चूमा है,
पाँवों को चूमा है,
पर आज भी तरपता हूँ,
परमीत, माँ के लिए.

माता-पिता


अगर न होते माता-पिता,
तो कैसा होता बचपन,
भूख से बिलखता मैं,
और, कचरे में ढूंढता भोजन।
अगर न होते माता – पिता,
तो कैसा होता योवन,
जुवा खेलता गलियों में,
और, करता मदिरा-सेवन।
अगर न होते माता – पिता,
तो कैसा होता जीवन,
मैं गुलामी करता किसी का,
और, लोग करते मेरा शोषण।
मैं शेर सा दहाड़ता हूँ,
परमीत, जाकर हर एक वन,
अगर न होते माता-पिता, तो,
गिदर सा उठता, किसी का जूठन।

चुनौती


मैं तोड़ दूंगा,
पहाड़ों को,
अगर वो,
कुचल न सके,
मेरी साँसों को.
मैं उलट दूंगा,
इस जमाने को,
अगर ये रोक न सका,
मेरे कदमों को.
मैं इसलिए नहीं आया,
धरती पे,
की छू सकूँ,
उचाईयों को.
मगर मैं जला दूंगा,
इस आसमान को,
अगर ये न बरसने दे,
बादल को, परमीत