एक कंकर सा मैं


ना शहर मेरा, ना राहें मेरी
ए जिंदगी, कैसे सम्भालूं तुझे?

ना चाँद मेरा, ना तारें मेरे
ए जिंदगी, कैसे सजाऊँ तुझे?

पुकारूँ किसे, बताऊं किसे?
जो दर्द हैं दिल में मेरे।

ना बाग़ मेरा, ना बहारें मेरी
ए जिंदगी, कैसे बहलाऊँ तुझे।

भटकना ही है किस्मत मेरी
भटकना ही है मंजिल मेरी।

ना सुबहा मेरी, ना रातें मेरी
ए जिंदगी, कैसे ठहराऊँ तुझे।

सावन में हूँ एक पतझड़ सा मैं
राहों में हूँ सबके एक कंकर सा मैं.

ना साथी कोई, ना साथ कोई,
ए जिंदगी, किसे सुनाऊँ तुझे?

Rifle Singh Dhurandhar

ना अपहरण, ना बलात्कार कीजिये


जिंदगी जहाँ पे दर्द बन जाए
वहीँ से शिव का नाम लीजिये।
अगर कोई न हो संग, राह में तुम्हारे
तो कण-कण से फिर प्यार कीजिये।

राम को मिला था बनवास यहीं पे
तो आप भी कंदराओं में निवास कीजिये।
माना की अँधेरा छाया हुआ हैं
तो दीप से द्वार का श्रृंगार कीजिये।

जिंदगी नहीं है अधूरी कभी भी
तो ना अपहरण, ना बलात्कार कीजिये।
माना की किस्मत में अमृत-तारा नहीं
तो फिर शिव सा ही विषपान कीजिये।

Rifle Singh Dhurandhar

वो भी क्या दिन थे?


वो भी क्या दिन थे?
पिता के साथ में
हम थे हाँ लाडले
आँखों के ख्वाब थे.

जो भी माँग लिया
वो ही था मिल जाता
वो थे आसमान
और हम चाँद थे.

भाग्या प्रबल था
और हम भी प्रबल थे
वो कृष्णा थे हमारे
हम प्रखर थे उनके छाँव में.

Rifle Singh Dhurandhar

हर – हर, हर -हर, शिवशंकर


हर – हर, हर -हर, शिवशंकर
महादेव, बम – बम.
कैलास से उतरो, की अनाथ से हैं हम.

भटक रहें हैं दर -दर
आ गए प्राणों पे भी लाले
तुम्ही बताओ पिता, अब किसको पुकारे हम?

भागीरथ को भय नहीं
हाँ, अपनी हार का
पर कब तक उठाएंगे हम माथे पे ये कलंक?

पीड़ा मेरी अब तो
पहाड़ सी हो गयी
अब तो खोल दो प्रभु अपने ये नयन.

Rifle Singh Dhurandhar

खाट लगाके


कटती नहीं हैं रातें पिया परदेश में आके
एक रात तो बिता लो संग खाट लगाके।

किससे करूँ मन की बातें, किसके संग मनुहार?
कोई दर्द फिर जगा दो, सीने से हमको लगाके।

Rifle Singh Dhurandhar

बालाम परदेशी हो गए


देहिया गुलाबी करके
नयना शराबी करके
बालाम परदेशी हो गए.

मनवा के गाँठ खोल के
चिठ्ठी – आ – पाती पढ़ के
बालाम परदेशी हो गए.

अंग – अंग पे निशानी दे के
चूल्हा-चुहानी दे के
बालाम परदेशी हो गए.

मुझको बेशर्म करके
लाली और मेहँदी हर के
बालाम परदेशी हो गए.

मुझसे छुड़ा के मायका
मुझको दिला के चूड़ियाँ
बालाम परदेशी हो गए.

करवट मैं फेरूं रात भर
सुनकर देवरानी की चुहल
बालाम परदेशी हो गए.

Rifle Singh Dhurandhar

बदनाम – बेशर्म – पावन – खलिहान – खाट


ए मेरे दिलवर
मुझे प्यार करके तू
बदनाम कर दे आज-२.

फिर पाने को तुझे
ढूंढती रहूं
बेशर्म होके मैं
हर सुबहों -शाम.

मेरा रूप-रंग, यौवन,
ये साजों-श्रृंगार
छू कर इन्हें
पावन कर दे आज.

तू बरसे मुझपे
बादल बनके
मैं भींगती रहूं
सारी-सारी रात.

लूट जाने दे मुझे
खलिहान में अपने
इससे मीठी ना होगी
किसी आँगन की खाट.

Rifle Singh Dhurnahdar

छपरहिया


हम छपरहिया
जैसे घूमे हैं पहिया
अरे, दुनिया घुमा दें.

अरे तीखें नैनों वाली
चोली की लाली
अरे हम चाहें तो
आँखों का सुरमा चुरा लें.

यूँ तो भोले -भाले
हैं हम सीधे -सादे
आ जाएँ खुद पे
तो बिजली गिरा दें.

Rifle Singh Dhurandhar

बहुत याद आते हो पिता


बहुत याद आते हो पिता
इस समंदर में.
ये युद्ध है सत्ता का
ये सुख है सत्ता का
सब अधूरा है इस आँचल में.

अम्बर तक पंख पसारे
उड़ता हूँ.
फिर भी एक सूनापन है
इस जीवन में.

मौत का वरन मुस्करा कर
कर लेंगें
अगर उस तरह आप मिलोगे।
प्रेम है तो बस पिता के आलिंगन में.

Rifle Singh Dhurandhar