तराशा गया हूँ


मैं तराशा गया हूँ इस कदर दर्द में
ना कोई ख्वाब है ना कोई आशा मन में.

पंख तो फड़फड़ाते हैं हर घड़ी ही
पर ना आसमा है ना ही उड़ान नभ में.

फूल खिले हैं काँटों में, या कांटें ही साथ हैं
जिन्दी ऐसी उलझी, कुछ भी नहीं रहा बस में.

Rifle Singh Dhurandhar

उठो, बढ़ो लड़ो और संघर्ष करो


कोई गरीब नहीं है, कोई अमीर नहीं है.
चंद सिक्कों का खेल है सब, पूरी तस्वीर नहीं है.
ये हंस-खेल रहे, उन्हें कोई सुकून नहीं है.
संसाधनों की लड़ाई है ये, कोई तकदीर नहीं है.
उठो, बढ़ो लड़ो और संघर्ष करो, महाराणा बन के
पढ़ो और बोलो की मुग़ल जालिम थे
वो कोई जिल्ले-इलाही नहीं थें.
इतना क्या शिकायत खुद से मुंतशिर?
ये आवाज और कलम किसी और की नहीं है.

Dedicate to Kavi Manoj Muntashir.

Rifle Singh Dhurandhar

किसान जमीन के हैं


ये किसान जमीन के हैं, ये पंक्षी आसमान के हैं
ये खुले बिचारो वाले निशान उस जहाँ के हैं.
और ये क्या कह रहे हो तुम सत्ता में आकर?
ये शब्द इंसान के नहीं, किसी शैतान के हैं.
मिटाने की हमें, हर जायज-नाजायज जोर कर लो तुम
पहली पंक्ति में कई आने को अभी बेताब से हैं.

भूख से लड़े हैं हम, क्या खूब लड़े हैं हम
मेरे आँगन से तुम्हारे आँगन तक
बूढी दादी ने पीसे जाँत, जागकर कई रातों को
उनकी साँसों का सैलाब, अब भी हमारे सीने में ज़िंदा से हैं.
मिटाने की हमें, हर जायज-नाजायज जोर कर लो तुम
पहली पंक्ति में कई आने को अभी बेताब से हैं.

हृदय टूटे तो टूटे, जंग में साँसे ना टूटे?
साँसे टूटे तो तो टूटे, हल हाथों से ना छूटे
तुम चाहे मीठे ख्वाब दिखा के जितना बरगला लो
सच्चे किस्से अब भी हमारी जुबान पे हैं.
मिटाने की हमें, हर जायज-नाजायज जोर कर लो तुम
पहली पंक्ति में कई आने को अभी बेताब से हैं.

Rifle Singh Dhurandhar

गज-ग्राह संग्राम


दो नैनों के भवर में सारा जग डूबा है
हे जगत के स्वामी तुम्हारा भक्त डूबा है.
आधा पहर ढल गया और सागर अथाह है
हे जगत के स्वामी तुम्हारा भक्त डूबा है.
सम्पूर्ण बल क्षीण हुआ, ग्रीवा तक अब नीर है
अंत समय में स्वामी अब तुम्हारा ही सहारा है.

Rifle Singh Dhurandhar

पुरवाई मैं झेल रही


मेरे मौला मैं थक गयी हूँ राहत के इंतजार में
कोई तो एक पल लिख दो, चैन मिले इस प्यार में.
आँखों में अश्क, और बेचैनी है रातो को
कब तक बैठूं यूँ खोल के किवाड़ मैं?
बेताब है टूटने को चूड़ियाँ और खनकने को पायल
दर्पण भी उल्हना मारे देख के मुझे श्रृंगार में.
अनाड़ी जाने बैठा है किस सौतन के ख्वाब में?
और पुरवाई मैं झेल रही विरहा की इस आग में.

Rifle Singh Dhurandhar

दर्द


दर्द है, तो जी लेने दो.
सिसक -सिसक कर ही सही
दो कदम चल लेने दो.
दर्द नहीं रहा तो हम नहीं होंगे।
जब तक जिन्दा हैं
जाम पी लेने दो.

Rifle SIngh Dhurandhar

क्या पालोगे धुरंधर?


जब दिल टुटा था, संभालना मुश्किल था
अब संभल गया हूँ, तो फिर टूटना मुश्किल है.

इस जमाने की भी क्या खूबी है?
की इसमें बेवफा को, बेवफा ही कहना मुश्किल है.

जो करते हैं वादे हर घड़ी प्यार -मोहब्बत के
उनका किसी पल भी, वादों पे टिकना मुश्किल है.

हया सारी निगाहों की उनकी है झूठी
की इस समंदर में किसी का भी टिकना मुश्किल है.

क्या पालोगे धुरंधर उनके आगोश में जाकर?
जिनके काँधे पे आँचल का भी टिकना मुश्किल है.

Rifle Singh Dhurandhar

चरित्र


जब दिल टुटा था तो संभालना मुश्किल था
अब जब संभल गया हूँ, तो फिर टूटना मुश्किल है.

मुझसे मत पूछो, वो कैसी हैं, कहाँ हैं?
बता दो उनको, हम कैसे हैं, कहाँ है?

मैं कोई दुर्योधन-दुशाशन नहीं जो उनका चीरहरण करूँ
ना उनका चरित्र ऐसा, जिसे पतित करने को मैं द्रुत-क्रीड़ा रचूं।

Rifle Singh Dhurandhar

पिता तुम्हारी चरणों में


पिता तुम्हारी चरणों में है, दुनिया में जन्नत जिसका नाम है.
पिता तुमसे बिछुड़कर अब मेरा जीवन धूल सामान है.
कहाँ मैं फिर उड़ा कभी, कहाँ अब वो मेरा आसमान है?
दाना तो चुग ही लेता हूँ, पर कहाँ अब वो मेरी उड़ान है?
पिता तुम्हारी चरणों में है, दुनिया में जन्नत जिसका नाम है.

एक -एक करके हार रहा हूँ, हर युद्ध मैं बिना आपके रण में
विफल हो रही है मेरी हर चेष्टा, अटल मेरा परिणाम है.
विनती अब बस इतनी ही है, अगर सुन रहा है विधाता
हर जन्म में पुत्र आपका रहूं, हृदय की बस ये ही पुकार है.
गोद में तुम्हारे जो अमृत मिला, वो कंठ पे बन के अनंत प्यास है.
पिता तुम्हारी चरणों में है, दुनिया में जन्नत जिसका नाम है

Rifle Singh Dhurndhar

तन्हाई


वो अब लौट नहीं सकती
और मैं दिल बदल नहीं सकता।
पति, देवर, सास-ससुर, बच्चे
जिंदगी का हर रंग जिया उसने।
मैं उस मुकाम पे आ गया की
तन्हाई के सिवा कोई रंग
भर नहीं सकता।

Rifle Singh Dhurandhar