पिता और मेरा प्रेम


पिता और मेरा प्रेम
जैसे गंगा की लहरों पे
उषा की किरणें
और प्रकृति मुस्करा उठी.

हर्षित पिता मेरी उदंडता पे
उन्मादित मैं उनकी ख्याति पे
पिता -पुत्र की इस जोड़ी पे
प्रकृति विस्मित हो उठी.

अभी जवानी चढ़ी ही थी
अभी मैं उनके रथ पे चढ़ा ही था
की प्रकृति ने
विछोह की घड़ी ला दी.

Rifle Singh Dhurandhar

काँटों की शहनाई


मैं तन्हा हूँ तन्हाई में
दिल की रुसवाई में
फूल हैं दूर -दूर
मैं काँटों की शहनाई में.

बहारें राहें बदल रहीं
मुझको ही देखकर
किस्मत के तारे सारे
बैठें मुख मोड़कर।
चाँद छुप गया कहीं
सूरज प्रखर बदली में.

आँखे जिसको ढूंढती
ह्रदय जिसको चाहता
उसकी ही कामना
मैं मिट जाऊं परछाईं से.

ये अधूरापन
दिल को डस रहा मेरे
नयनों के ख्वाब भी
हैं अब विष के प्याले से.

Rifle Singh Dhurandhar

छापरहिया एक बादल


मेरे मुख का दर्प ये ही हैं
ये ही हैं मेरे सागर।
पाकार इनसे जीवन-अमृत
हुआ मैं दम्भ में पागल।

अट्टहास लगाता जीवन में हूँ
की कोई छीन नहीं सकता मेरे ये आनंद।
सुशीला- धुरंधर का लाल मैं
फीका जिसके आगे स्वर्ग, मेनका का आंचल।

उसपे मैं तोमर राजपूत
और छापरहिया एक बादल।
जहां पे मैं ठहर जाऊं
वहीँ पे बरसे सावन।

The poem is written for my father and mother. It is the best blessing I have in my life.

Parmit Singh Dhurandhar

शौक ना कर


इतना शौक ना कर, आँखों का ए दिल
तुझको बहलाना फिर मुश्किल हो जाए.
वो घटा हैं सावन की एक
उनका ठहरना कहीं तुझे डुबों ना जाए.

परमीत सिंह धुरंधर 

उसने कई शौहर रखें हैं


ना मांग मुँह खोल के इस जमाने से ए दोस्त
अब कहाँ वैसे रिश्ते बचे हैं?

ना मायूस हो कर देख गमे-जिंदगी को
अभी तो जिंदगी के कई दौर बचे हैं.

सिसक -सिसक के नहीं, घूम-घूम के जी लेंगें
अभी तो किस्मत के कई सितारे बचें हैं.

मोहब्बत और सियासत में ना भरोसा कर किसी का
यहाँ पैसों की खनक पे दिल बिकें हैं.

ना ये शहर किसी का, ना हुस्न ही किसी का
इसी शहर में उसने कई शौहर रखें हैं.

परमीत सिंह धुरंधर 

मोती बिखरे हैं


ये जो मेरे दिल के ख्वाब टूटे हैं
कह दो समंदर से कुछ मोती बिखरे हैं.
बूंदों को ना ढल्काउँगा अपनी पलकों से
अब भी इन आँखों में कुछ ख्वाब नए हैं.

परमीत सिंह धुरंधर 

सुशांत सिंह राजपूत की जंग जारी रखेंगें


मैं तो मुंबई से पहले ही परास्त हुआ
तुम तो मुंबई तक पहुँच गए.
मैं अपने पहली ही जंग में हार गया
तुम तो कितने जंग फतह कर गए.
यह लड़ाई न मेरी है, ना यह जंग तुम्हारी थी
ये जंग हमारी है, हाँ ये जंग हम सबकी है.
यह जंग है,
हमारे सपनों की उनके गुनाहों से
हमारे अधिकारों की उनकी सत्ता से
हम छोटे शहर की चींटियों की
इन जंगल के हांथियों से.
चाणक्य की
धनानंद के उन्माद और अहंकार से.

आज भले हम हार गए
आज भले दूर -दूर तक
हमारे सितारे धूमिल हैं.
मगर हम शिवाजी के छोटे झुण्ड में आते रहेंगें
और लुटते रहेंगे इनके महलों को
इनकी खुशियों को, तब तक
जब तक औरंगजेब की इस सत्ता
को नष्ट ना कर दे,
तबाह ना कर दे.

हम चीटिंयां हैं चाणक्या के
हम चिड़ियाँ हैं गुरु गोबिंद सिंह जी के
हम कटेंगे, हम गिरेंगे, पर लड़ेंगें तब तक
जब तक विजय श्री हमारी नहीं।
आज चाहे जितना उत्सव माना लो मेरे अंत का
कल तुम्हारा जयदर्थ सा अंत करेंगे।

परमीत सिंह धुरंधर 

अपने बेगम की चोली का रंग लाल हूँ


बेलगाम, बेधड़क, बेदाग़, बेबाक हूँ
हर खेल का माहिर धुरंधर
छपरा का मस्तान हूँ
जी हाँ, मैं खुद में एक बिहार हूँ.

रंगों से बना नहीं
मगर हर एक रंग में शामिल हूँ
कुवारियों के आँखों का ख्वाब
विवाहितों के दिल की कसक
मैं अपने बेगम की चोली का रंग लाल हूँ।
जी हाँ, मैं खुद में एक बिहार हूँ.

नागार्जुन का विद्रोह
दिनकर की आवाज हूँ
बुद्ध, महावीर का तप – त्याग
गुरु गोविन्द सिंह जी और चाणक्य
का शंखनाद हूँ.
जी हाँ, मैं खुद में एक बिहार हूँ.

पनघट पे गोरी की मुस्कान
मस्ती में बहता किसान हूँ
पुरबिया तान, खेत -खलिहान
फगुआ में भाभियों की सताता
निर्लज -बदमाश हूँ.
जी हाँ, मैं खुद में एक बिहार हूँ.

परमीत सिंह धुरंधर 

गुलिस्तां


मेरे आंसूओं ने तेरी यादों के गुलिस्तां को
ऐसे ज़िंदा रखा है
क्या बसंत, क्या सावन, क्या पतझड़?
हर मौसम फीका है

परमीत सिंह धुरंधर