उसकी आँखों में क्या दर्द दे गए?


जिसे खेत में लूट कर तुम नबाब बन गए
उससे पूछा क्या कभी?
उसकी आँखों में क्या दर्द दे गए?
एक चिड़िया
जिसने अभी सीखा नहीं था दाना चुगना
तुम दाने के बहाने जाल डालके
उसका आसमान ले गए.
कई रातों तक देखती थी जो ख्वाब
घोनषलॉन से निकल कर एक उड़ान भरने का
उसके पंखों को बाँध कर
तुम उसका वो सारा ख्वाब ले गए.

परमीत सिंह धुरंधर

हुस्न की एक मल्लिका


वो जब हुस्न की एक मल्लिका बनीं
तो समझी की वो एक खुदा बनीं।
और तुरंत उनका फैसला आ गया
की वो अब से किसी और की बनीं।

परमीत सिंह धुरंधर

एक जन्नत आ गया है


ए दोस्त
दुश्मनों को बता दो
शहर में कोई नया आ गया है.

ये रंगत, ये लज्जत
ये नजाकत
अरे, पूरा – का – पूरा
एक जन्नत आ गया है.

परमीत सिंह धुरंधर

लड़की वो थी केरला की


लड़की वो थी केरला की,
कर गयी हमसे चालाकी।
आँखों से पिलाया हमको,
और बाँध गयी फिर राखी।

लड़की वो थी पंजाब की,
पूरी – की – पूरी शहद में लिपटी।
बड़े – बड़े सपने दिखलायें,
और फिर बोल गयी हमें भैया जी.

लड़की वो थी बंगाल की,
कमर तक झुलाती थी चोटी।
शरतचंद्र के सारे उपन्यास पढ़ गई,
सर रख के मेरे काँधे पे.
और आखिरी पन्ने पे बोली,
तय हो गयी है उसकी शादी जी.

लड़की वो थी हरियाना की,
चुस्त – मुस्त और छरहरी सी.
हाथों से खिलाती थी,
बोलके मुझको बेबी – बेबी,
और बना लिया किसी और को,
अपना हब्बी जी.

लड़की वो थी दिल्ली की,
बिलकुल कड़क सर्दी सी.
लेकर मुझसे कंगन और झुमका,
बस छोड़ गयी मेरे नाम एक चिठ्ठी जी.

 

परमीत सिंह धुरंधर

सिलिकॉन – ट्रांसप्लांट ह्रदय में करवाती


अगर मोहब्बत में लड़कियाँ,
जिस्म को नहीं ह्रदय को देखतीं।
तो सिलिकॉन – ट्रांसप्लांट वक्षों में नहीं,
ह्रदय में करवाती।

अगर लड़कियों की मोहब्बत में,
मीरा – राधा सा प्रेम होता, और वासना न होती,
तो वो प्रेम में उम्र और जवानी ना देखतीं।

अगर लड़कियाँ इश्क़ में,
आशिकों का जेब ना टटोलती।
तो सैनिकों को राखी नहीं, प्रेम – पत्र भेजतीं।

 

परमीत सिंह धुरंधर

नाक की नथुनी कही और से ही तुड़वा लिया


मेरी वफ़ा का सिला उसने कुछ ऐसे दिया,
मेरे बागों के फूल से गजरा गुंथा,
और किसी के सेज पे उसे तोड़ दिया।
आँखों की शर्म – हया थी बस मेरे लिए,
जुल्फों की छाँव किसी और को ओढ़ा दिया।
रूठ – रूठ कर मांगती थीं पायल – कंगन मुझसे,
और नाक की नथुनी कही और से ही तुड़वा लिया।

 

परमीत सिंह धुरंधर

उस लड़की के वक्षों पे


यारो मैं प्यार करूँगा उस लड़की की बाहों में,
जिसके सपनों में बस हम हों,
और कोई ना हो उन आँखों में.
मेरा इंतजार जो करती हो चूल्हे और चौखट के बीच में,
चैन ना हो, जब तक आवाज घुंघरू की मेरे बैलों के,
पड़ ना जाये उन कानों में.
यारों मैं अंक भरूंगा उस लड़की के अंगों से,
जिसके सपनों में बस हम हों,
और कोई ना हो उन आँखों में.
जो बिना मुझे खिलाएं, ना खाये एक अन्न का भी दाना,
बिना मेरे मुस्कान के, ना खनके पायल जिसके पावों में.
यारों मैं तो रंग डालूंगा उस लड़की के वक्षों पे,
जिसके सपनों में बस हम हों,
और कोई ना हो उन आँखों में.

 

परमीत सिंह धुरंधर