गरल सहज है


एक परम है, एक ही सत्य है
शिव के आगे समस्त शुन्य है.
रंग – तरंग के सब हैं प्यासे
बस योगी के कंठ में गरल सहज है.
इस छोर से उस छोर तक
ना आदि, ना इसका कोई अंत है.
धूम मचाती चली थी गंगा
अब योगी के जाटवों में घर है.
उसी योगी के चरण में मैं हूँ
बस यही चरण मेरा जीवन है.

परमीत सिंह धुरंधर

मैं भगीरथ बनूँगा क्या?


धरा पे मैं फिर से
कोई भगीरथ बनूँगा क्या?
मेरे लिए हे शिव,
आप अपनी जटायें खोलेंगे क्या?

जब मन भय से ग्रस्त हो
कर्म पे बढ़ा अटल हो
मैं पुकारूँ,
तो हे शिव आप मेरे लिए आवोगे क्या?

मैं छोडूंगा नहीं हे शिव चरण तुम्हारे
तुम सुनो, ना सुनो,
रहूँगा तुम्हे पुकारते
मुझे यूँ आँखों की धारा में
हे शिव डूबता छोड़ोगे क्या?

परमीत सिंह धुरंधर

शिव विष धारण कर गए


जिंदगी को जीने का
अपना – अपना विचार है.
जब बंट रहा था अमृत
तो शिव विष धारण कर गए.
सोने की लंका का त्याग कर
कैलास को पावन कर गए.
भगीरथ के एक पुकार पर
प्रबल-प्रचंड गंगा को
मस्तक पर शिरोधार्य कर गए.
जब बंट रहा था अमृत
तो शिव विष धारण कर गए.

गर्व का त्याग कर
कृष्णा सारथि बने कुरुक्षेत्र में.
सब सुखों का श्रीराम
परित्याग कर गए.
हिन्द की इसी धरती पे
जब रचा गया चक्रव्यूह
तो वीरता के अम्बर को
अभिमन्यु दिव्यमान कर गए.
जब बंट रहा था अमृत
तो शिव विष धारण कर गए.

परमीत सिंह धुरंधर

मैं भक्त हूँ भगवान् शिव का


ए चाँद मेरी गलियों में
आना – जाना छोड़ दे.
मैं भक्त हूँ भगवान् शिव का
मुझे ललचाना छोड़ दे.

जिसने धारण किया है
विष को अपन कंठ में
उसके अधरों के पान की
अभिलाषा छोड़ दे.
मैं भक्त हूँ भगवान् शिव का
मुझे ललचाना छोड़ दे.

भूत – भभूत – डमरुँ
पे जो रीझ जाए
उसपे नयनों के
तीर चलाना छोड़ दे.
मैं भक्त हूँ भगवान् शिव का
मुझे ललचाना छोड़ दे.

जब – जब आस टूटती है
मानव की
तब प्रभु शिव हरते हैं
पीड़ा भक्तों की.
मुझे ऐसी भक्ति से
भटकाना छोड़ दे.
मैं भक्त हूँ भगवान् शिव का
मुझे ललचाना छोड़ दे.

मुझसे भी बलिष्ठ और कर्मनिष्ठ
बहुत है यहाँ।
इस अवघड-फ़कीर को
आजमाना छोड़ दे.
मैं भक्त हूँ भगवान् शिव का
मुझे ललचाना छोड़ दे.

 

परमीत सिंह धुरंधर

वैराग


पल – पल में इरादों का विखंडन होता है
पल – पल में इरादों का सृजन होता है.
ये संसार तो अनंत है, अनंत ही अनंत है
यहाँ एक युद्ध में हार से
नहीं जीवन का कभी अंत होता है.

स्वयं जो इस सृस्टि का ब्रह्म है
उस साक्षात् शिव को भी
विष का करना पान होता है.
पल – पल में जीवन का त्रिस्कार होता है
पल – पल में जीवन का अपमान होता है.
जो इनसे परे होकर ना विशलित हो कभी
शिव के समक्ष वही वैराग होता है.

मैं फिर पुलकित होऊंगा ए मेरी शाखाओं
फिर वही पुष्प और फल धारण करूंगा मेरी शाखाओं
की हर पतझड़ के बाद विकसित वसंत होता है.
पल – पल में जीवन का विनाश होता है
पल – पल में जीवन का आरम्भ होता है.
ये संसार तो अनंत है, अनंत ही अनंत है
यहाँ एक युद्ध में हार से
नहीं जीवन का कभी अंत होता है.

परमीत सिंह धुरंधर

पिता बन कर


हर जनम में पिता बन कर
हे प्रभु शिव
रखों मेरे सर पे अपना हाथ.
और मैं पुत्र बनकर
आपके चरणों को धो के पीता रहूँ
जपता रहूँ आपका नाम.

 

परमीत सिंह धुरंधर

रोम – रोम से गजानन हम आपका गुणगान कर रहे


प्रभु आप जब से जीवन को साकार कर रहे,
रोम – रोम से गजानन हम आपका गुणगान कर रहे.
चक्षुओं को भले प्रभु आपका दर्शन ना मिला हो,
हम साक्षात् ह्रदय से परमानंद का आभास कर रहे.

अद्भुत है आपका अलंकार देवों में,
स्वयं महादेव भी ये बखान कर रहे.
लाड है, प्यार है माँ पार्वती को आपसे,
जग में शक्ति को प्रभु आप स्वयं सम्पूर्ण कर रहे.

मैं भिखारी हूँ, भिक्षुक हूँ दर का प्रभु आपके,
कृपा है प्रभु आप मुझपे नजर रख रहे.
आपके चरण-कमलों में हो मस्तक मेरा भी,
बस इसलिए प्रभु हम आपका नाम जप रहे.

 

परमीत सिंह धुरंधर