भोजपुरी भाषा की प्रचुरता का प्रमाण:1


दुनिया में सबसे ज्यादा पर्यायवाची शब्द पति के लिए भोजपुरी भाषा में ही है. जैसे बिहार की महिलायें अपने पति को निम्न शब्दों से सम्भोधित करती हैं. इसका एक प्रमुख कारण है की वो पति का नाम नहीं लेती हैं.
करेजा, राजा, रजऊ, करेजऊ, भतार, पति, परमेश्वर,भगवान्, भ्रह्मबाबा, बाबू, देवता, मुखिया, बाबूसाहेब, मास्टर साहेब, उनकर भइया, भलुआ के पापा, मुनिया के चाचा, छोटुआ के फूफा, बबुनी के जीजा, आँख के तारा, जलेबी, रसगुल्ला, प्राणनाथ, स्वामी, प्राणेश्वर, इत्यादि।

परमीत सिंह धुरंधर

न करे खर्च एक रुपया


काला – काला सैया मेरा
जैसे कोई कउआ.
दिन भर करे टर्र – टर्र
रात में चढ़ा के पउआ.

दुःख का पहाड़ टूटा है सखी
जाने क्या देख, बाबुल बाँध गए पल्ला?
मेरी भारी जवानी पे
न करे खर्च एक रुपया।

परमीत सिंह धुरंधर

शयनकक्ष के झरोखे से : भाग – 2 (पत्नी और उसकी बिछड़ी बहन)


रश्मि, “क्या जी आज कल किसके साथ लगे रहते हो फ़ोन पे. घर पे कोई तुम्हारे साथ है, उसपे भी कोई ध्यान दे दो.”
मैं, “अरे ध्यान तो तुम ही नहीं देती। जैसे भी रात होती हो, तुम तो अपने दर्पण की बाहों में चली जाती हो.”
रश्मि,”सुनो, मैं सही में पूछ रही हूँ. कौन है, किसके साथ तुम ये बात करते हो? मैं अपने जीवन में कोई और किस्सा नहीं चाहती।”
मैं, “हंस कर अरे तुम भी ना. अरे ये कोई नहीं, सुजाता है.”
रश्मि ने पहली बार दर्पण को छोड़कर, मेरी तरफ मुड़कर अपनी दोनों आँखों से सीधे – सीधे देखते हुए पूछा की ये सुजाता कौन है, और मैं कब मिला।
मैं भी अचंभित की क्या हो गया इसको।
मैंने पता नहीं क्यों बिना मज़ाक किये या बात को बढ़ाये ही उसे बताना उचित समझा की सुजाता कौन है. शायद एक साल के साथ के बाद हर पति समझ जाता है की पत्नी को ना छेड़ा जा सकता है न ही उससे मज़ाक किया जा सकता है. तभी तो घर के बाहर कोई चाहिए एकांत में छेड़खानी के लिए. शादी के बाद के अवैध संबंधों का ये ही कारण है.
मैंने कहा, “अरे तुम्हारी छोटी बहन, मेरी साली सुजाता।”
दो मिनट की मौन के बाद सायद उसे एहसास हो गया की मैं क्या सोच रहा हूँ.
उसने कहा, “अरे तो सीधे बोलो न की मेरी बहन से बात करते हो. यहाँ तो हर गली – गली में कितनी सुजाता होंगी। और इतना क्या रोज – रोज मेरी बहन से बात करोगे, की मैं समझ जाऊं। मुझे तो अभी भी शक है और सुजाता ने मुझे तो तभी तुम्हारी कोई कही बात नहीं बोली की मैं शक ना करूँ।”

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रश्मि, “सुनो, आज तुम्हारी सुजाता से बात हुई थी या आज कल बंद है.”
मैंने, “हुई थी बाबा, वो रोज मुझे दफ्तर में भी कॉल कर देती है, अगर मोबाईल पे रिप्लाई न दूँ.”
रश्मि, “लेकिन आज मुझे दो घंटे बात हुई. मैंने कितनी बार तुम्हारा नाम लिया। कितना उससे पूछा, कितना तुम्हारे बारे में मैं बोली। उसने तो कुछ भी नहीं कहा.
मैं, “अरे मुझे क्या पता, तुम बहनों में क्या है?”
रश्मि, “मुझे अपना फ़ोन दो और उसका नंबर दिखावो, मुझे पूरा यकीन हैं ये सुजाता शायद मेरे कुम्भ के मेले में बिछड़ी बहन है. मुझे भी अब उससे मिलना है.”
मैंने पुरे आत्मविश्वास के साथ सर झुका कर फ़ोन उसको सौंप दिया।
पूरी जॉंच – पड़ताल के बाद फ़ोन मुझे सौंपते हुए रश्मि बोली, “चाय पीनी है.”
मेरे कुछ बोलने से पहले ही वो रसोई की तरफ जाती बोली, “पकोड़े भी बना देती हूँ, बहार ठण्ड हैं.”

 

परमीत सिंह धुरंधर

 

सर्वोत्तम भार्या


नित संवर कर जो मन को लुभाती हो,
सीने से लग कर जो हर दर्द हर लेती हो.
भार्या वही सर्वोत्तम है जो हर स्थिति में,
अपने चौखट पे हर पल मुस्काती हो.

उषा का जो आँगन में स्वागत करे,
निशा को जो नयनों से चंचल करे.
भार्या वही सर्वोत्तम है जो हर स्थिति में,
जो सेज पे सखी सा सम्मोहित कर लेती हो.

 

परमीत सिंह धुरंधर

मेरी बीबी बिहारन


मैं बिहारी,
मेरी बीबी बिहारन।
मैं करूँ चूल्हा – चौकी,
वो ले धुप-सेवन।
मैं बिहारी,
मेरी बीबी बिहारन।

मेरी कमर झुक रही,
उसका नित खिलता यौवन।
चार-चार बच्चे,
मैं सम्भालूं।
और चालीस में भी,
उसे मांगे रितिक रोशन।
मैं बिहारी,
मेरी बीबी बिहारन।

मैं पढ़ा -लिखा हो कर भी,
अनपढ़ – गवार।
वो शुद्ध देशी,
मोह ले किसी का भी मन.
मैं बिहारी,
मेरी बीबी बिहारन।

मैं मदिरा मांगू,
वो पिलाये मट्ठा।
मैं बोलूं मुर्ग-मसल्लम,
तो वो खिलाये लिट्टी-चोखा।
पर मेरी साँसों को,
वो लगती, हर दिन ए-वन.
मैं बिहारी,
मेरी बीबी बिहारन।

मेरे वीरान जीवन की,
वो सुन्दर उपवन।
उसकी मुस्कान ही है,
मेरा तन-मन-धन.
मैं बिहारी,
मेरी बीबी बिहारन।

 

परमीत सिंह धुरंधर

 

 

मेरी बीबी है बिहार की


मेरी बीबी है बिहार की,
बिस्तर पे भी रखती है,
घूँघट चार हाथ की.
चार – चार बच्चों की,
अम्मा बन गयी.
पर मैं देख ना पाया,
आज तक तिल उसके नाक की.
मेरी बीबी है बिहार की.

केश ही नहीं, जिस्म पे भी,
लगा लेती है रातों को, करुआ तेल.
चुम्बन की कोसिस में,
मैं फिसलता हूँ ऐसे,
जैसे बंद मुट्ठी में रेत.
कहती है, “आप मेरे भगवान् हो”.
और वो तुलसी मेरे आँगन की.
मेरी बीबी है बिहार की.

 

परमीत सिंह धुरंधर

मेरी बीबी और मैं


झगड़े की शुरुआत,
रोटी से हुई.
मैंने कहा, “ये तो गोल नहीं है”.
उसने कहा, “खुश रहो, वरना ये भी तुम्हारी नसीब नहीं है”.
हद तो तब हो गयी,
करवा चौथ उसकी,
और उपवास मुझे रखना पड़ा.
बेगम पड़ी रहीं, दिन भर बिस्तर पे,
और मुझे खाली पेट,
उनके हाथों में मेहँदी,
और पावों में आलता लगाना पड़ा.

हर रिश्ता मेरा चुभता है उसकी आँखों में,
क्यों की, मैं उसकी माँ का बेटा नहीं बन पाया।
जवानी की सारी गलतफहमी मिट गयी,
सोचा था चार -चार शादी करूँगा,
मगर यहाँ एक से हिम्मत टूट गयी.
मुक्कम्मल जहाँ बसाने के लिए,
मैं दोस्तों के कहने पे घोड़ी चढ़ गया.
मुझे क्या पता था?
की कभी किसी को मुक्कम्मल जहाँ नहीं मिलता।

 

परमीत सिंह धुरंधर