कमरे में दिया


खूबसूरत जिस्म पे जवानी का नशा
सखी, कटती नहीं रातें अब तो बालम बिना।
आँखों का काजल सुलगता है पूरी रात
जैसे जलता है मेरे कमरे में दिया।

परमीत सिंह धुरंधर

चारपाई भी चूल्हा के आग लागे ला


जब – जब कोयलिया कुहके बाग़ में
मन में हुक उठे ला.

दू गो हमार नैना राजा जी
विरह में पोखर पे सांझ ढले ला.

छोड़ दी शहर के कमाई
चारपाई भी चूल्हा के आग लागे ला.

परमीत सिंह धुरंधर

मिट्टी में लोटना


राम जी ने भी लक्ष्मण से कहा था, “मिट्टी में लोटना ज्यादा आनंददायक और मीठा है, वनिस्पत रण में दुश्मन को बांधना।”

परमीत सिंह धुरंधर

शराफत


शहर समझता है नादान हमें
शहर को क्या पता?
रोशन है ये शहर हमसे।

सांझ ढले वो आ जाती है छत पे
बदनाम हम हैं, मगर वो भी कब से
हैं अपनी शराफत छोड़ चुके।

परमीत सिंह धुरंधर