गरल सहज है


एक परम है, एक ही सत्य है
शिव के आगे समस्त शुन्य है.
रंग – तरंग के सब हैं प्यासे
बस योगी के कंठ में गरल सहज है.
इस छोर से उस छोर तक
ना आदि, ना इसका कोई अंत है.
धूम मचाती चली थी गंगा
अब योगी के जाटवों में घर है.
उसी योगी के चरण में मैं हूँ
बस यही चरण मेरा जीवन है.

परमीत सिंह धुरंधर

मैं भगीरथ बनूँगा क्या?


धरा पे मैं फिर से
कोई भगीरथ बनूँगा क्या?
मेरे लिए हे शिव,
आप अपनी जटायें खोलेंगे क्या?

जब मन भय से ग्रस्त हो
कर्म पे बढ़ा अटल हो
मैं पुकारूँ,
तो हे शिव आप मेरे लिए आवोगे क्या?

मैं छोडूंगा नहीं हे शिव चरण तुम्हारे
तुम सुनो, ना सुनो,
रहूँगा तुम्हे पुकारते
मुझे यूँ आँखों की धारा में
हे शिव डूबता छोड़ोगे क्या?

परमीत सिंह धुरंधर

कण – कण में व्याप्त है श्रीराम


कण – कण में व्याप्त है श्रीराम
चाहे अयोध्या हो या अंडमान।

मंदिर बने या ना बने
जयकारों में गूँजते रहेंगे श्रीराम।

भूमण्डल के हर कोने – कोने मे
जन – जन के ह्रदय में है श्रीराम।

परमीत सिंह धुरंधर

श्री हरी विष्णु


तुम करुणामयी भक्तवत्सल
तुम धर्म का आधार हो.
सर्वव्यापी, निरंतर, अचर-अगोचर तुम
तुम सनातन साकार हो.
मैं मुर्ख -अज्ञानी – पापी
मुझे क्षमा करो, मेरा उधार हो.
सृष्टि के आदिकर्ता, पालक – संहारक तुम
तुम ब्रह्म निराकार हो.
जीव – अजीव सब तुममे समाहित
तुम कण – कण में विराजमान हो.

परमीत सिंह धुरंधर

मैं कोमल – कुमुदुनी हूँ


ना खेलो मेरे ह्रदय से
मैं कोमल – कुमुदुनी हूँ.

अपना बना लो मुझे
आतुर मैं प्रचंड अग्नि हूँ.

व्यर्थ न करो मेरे तन – मन को
मैं तुम्हारी जीवन – संगिनी हूँ.

क्या प्राप्त कर लो गे, गंगा-पुत्र?
इस प्रतिज्ञा को पाल कर.
भीष्म तो बन जाओगे
पर मैं तुम्हारी अधूरी – जिंदगी हूँ.

मेरी साँसों में प्रवाहित हो तुम
मैं ही तुम्हारी अर्धांगिनी हूँ.

परमीत सिंह धुरंधर

जन – जन के ह्रदय में हैं श्रीराम


जब श्रीराम को आना होगा
श्रीराम आयेंगे।
अत्याचारी से कह दो
संग हनुमान जी भी आयेंगे।
जब मंदिर बनना होगा
मंदिर बन जाएगा।
जन – जन के ह्रदय में हैं श्रीराम
ह्रदय से कैसे मिटाओगे?

इस माटी का रंग उनसे
इस माटी की खुशबु हैं श्रीराम।
मीठी हो जाती है धुप भी
अगर लिख दें
हम आँगन में श्रीराम।
घर – घर में बसे हैं
हनुमान-ध्वज में श्रीराम
घर – घर से कैसे मिटाओगे?

परमीत सिंह धुरंधर

क्यों Fair & Lovley ढूंढती हैं?


नदिया हमसे
ये सवाल पूछती है.
किसके पाँव पखारूँ?
वो नाम पूछती है.

पत्थर बन गया
एक सुन्दर सी नारी
फिर क्यों भारत की लड़कियाँ
Fair & Lovley ढूंढती हैं?

यहाँ पत्थर पे भी
तुलसी चढ़ती है.
फिर क्यों भारत की लड़कियाँ
Fair & Lovley ढूंढती हैं?

परमीत सिंह धुरंधर