हे गजानन, आपका अभिनन्दन।


विशाल देह, विशाल कर्ण, विशाल नयन
हे गजानन, आपका अभिनन्दन।

महादेव के लाडले, गौरी – नंदन
हे गजानन, आपका अभिनन्दन।

आपके चरण-कमलों से बढ़कर नहीं कोई बंदन
हे गजानन, आपका अभिनन्दन।

सफल करो मेरे प्रभु अब मेरा भी जीवन
हे गजानन, आपका अभिनन्दन।

नित ध्यायु आपको, करूँ आपका ही श्रवण
हे गजानन, आपका अभिनन्दन।

मैं पापी, मुर्ख, अज्ञानी, जाऊं तो जाऊं किसके अब शरण
हे गजानन, आपका अभिनन्दन।

बस जाओ, हे प्रभु, अब मेरे ही आँगन
हे गजानन, आपका अभिनन्दन।

सुबह-शाम पखारूँ मैं आपके चरण
हे गजानन, आपका अभिनन्दन।

परमीत सिंह धुरंधर

जीवन-पथ पे भीष्म सा त्याग करो


जो मिले हैं, उनको प्यार करो
जो बिछुड़ गए, उन्हें याद करो
तुम मानव हो, बिना बिचलित हुए
इस जीवन-पथ पे, निरंतर प्रयास करो.

तुम देव नहीं, जो भोग मिलेगा
तुम पशु नहीं जो स्वछन्द विचरण करेगा
तुम मानव हो, बिना विचलित हुए
इस जीवन-पथ पे, निरंतर अभियान करो.

पथ में कुछ छाले मिलेंगें
पथ में कुछ कांटे भी मिलेंगे
सुन्दर अप्सराएं कभी,
दिखलायेंगी अपनी अदायें
तुम अपने ह्रदय से अब
माया-मिलन-मोह का त्याग करो.
तुम मानव हो, बिना विचलित हुए
इस जीवन-पथ पे, निरंतर हुंकार भरो.

क्या है नारी के देह में?
और क्या है उसके वक्षों पे?
कौन है सुन्दर वो नारी जो?
गृहणी बनकर संतुस्ट हुई
और कौन तृप्त हुई?
भला नगर-वधु बनकर।
तुम मानव हो, बिना विचलित हुए
इस जीवन-पथ पे, भीष्म सा त्याग करो.

परमीत सिंह धुरंधर

मिट्टी में लोटना


राम जी ने भी लक्ष्मण से कहा था, “मिट्टी में लोटना ज्यादा आनंददायक और मीठा है, वनिस्पत रण में दुश्मन को बांधना।”

परमीत सिंह धुरंधर

हे गणपति अब तो पधारो


हे गणपति अब तो पधारो
टूट रहा मेरा आस भी.
निरंतर असफलताओं के मध्य, हे अवनीश
कब तक करूँ और प्रयास भी?

हे गजानन, हे वक्रकुंड
अब तो रख दो मस्तक पे हाथ ही.
कुछ तो मिले सहारा प्रभु देवव्रता
कब तक भटकता रहूं?
मरुस्थल में यूँ असहाय ही.

एक आपका नाम जपकर हे गौरीसुता
सबका बेड़ा पार हुआ.
कब तक मैं पुकारूँ आपको हे गदाधर?
छूट रहा मेरा सांस भी.

आपका – मेरा अनोखा है रिश्ता, हे गजकर्ण
आप मेरे अग्रज, आप ही सखा
आप ही मेरे भाग्या भी.

अब तो निष्कंटक कर दो
पथ मेरा, हे गणाधाक्ष्य
बिन आपके इक्क्षा और आशीष के हे चतुर्भुज
रख नहीं सकता मैं एक पग भी.

हे गणपति अब तो पधारो
टूट रहा मेरा आस भी.
निरंतर असफलताओं के मध्य, हे अवनीश
कब तक करूँ और प्रयास भी?

परमीत सिंह धुरंधर

शिव विष धारण कर गए


जिंदगी को जीने का
अपना – अपना विचार है.
जब बंट रहा था अमृत
तो शिव विष धारण कर गए.
सोने की लंका का त्याग कर
कैलास को पावन कर गए.
भगीरथ के एक पुकार पर
प्रबल-प्रचंड गंगा को
मस्तक पर शिरोधार्य कर गए.
जब बंट रहा था अमृत
तो शिव विष धारण कर गए.

गर्व का त्याग कर
कृष्णा सारथि बने कुरुक्षेत्र में.
सब सुखों का श्रीराम
परित्याग कर गए.
हिन्द की इसी धरती पे
जब रचा गया चक्रव्यूह
तो वीरता के अम्बर को
अभिमन्यु दिव्यमान कर गए.
जब बंट रहा था अमृत
तो शिव विष धारण कर गए.

परमीत सिंह धुरंधर

मैं भक्त हूँ भगवान् शिव का


ए चाँद मेरी गलियों में
आना – जाना छोड़ दे.
मैं भक्त हूँ भगवान् शिव का
मुझे ललचाना छोड़ दे.

जिसने धारण किया है
विष को अपन कंठ में
उसके अधरों के पान की
अभिलाषा छोड़ दे.
मैं भक्त हूँ भगवान् शिव का
मुझे ललचाना छोड़ दे.

भूत – भभूत – डमरुँ
पे जो रीझ जाए
उसपे नयनों के
तीर चलाना छोड़ दे.
मैं भक्त हूँ भगवान् शिव का
मुझे ललचाना छोड़ दे.

जब – जब आस टूटती है
मानव की
तब प्रभु शिव हरते हैं
पीड़ा भक्तों की.
मुझे ऐसी भक्ति से
भटकाना छोड़ दे.
मैं भक्त हूँ भगवान् शिव का
मुझे ललचाना छोड़ दे.

मुझसे भी बलिष्ठ और कर्मनिष्ठ
बहुत है यहाँ।
इस अवघड-फ़कीर को
आजमाना छोड़ दे.
मैं भक्त हूँ भगवान् शिव का
मुझे ललचाना छोड़ दे.

 

परमीत सिंह धुरंधर

वैराग


पल – पल में इरादों का विखंडन होता है
पल – पल में इरादों का सृजन होता है.
ये संसार तो अनंत है, अनंत ही अनंत है
यहाँ एक युद्ध में हार से
नहीं जीवन का कभी अंत होता है.

स्वयं जो इस सृस्टि का ब्रह्म है
उस साक्षात् शिव को भी
विष का करना पान होता है.
पल – पल में जीवन का त्रिस्कार होता है
पल – पल में जीवन का अपमान होता है.
जो इनसे परे होकर ना विशलित हो कभी
शिव के समक्ष वही वैराग होता है.

मैं फिर पुलकित होऊंगा ए मेरी शाखाओं
फिर वही पुष्प और फल धारण करूंगा मेरी शाखाओं
की हर पतझड़ के बाद विकसित वसंत होता है.
पल – पल में जीवन का विनाश होता है
पल – पल में जीवन का आरम्भ होता है.
ये संसार तो अनंत है, अनंत ही अनंत है
यहाँ एक युद्ध में हार से
नहीं जीवन का कभी अंत होता है.

परमीत सिंह धुरंधर