हर रात जलती हूँ मैं,
जिसकी आगोश में,
उसी को नहीं पता कि,
कितना जली हूँ मैं इस प्यास में.
बुझ जाती है हर रात जवान हो के,
एक ही सांस में,
रह जाती हूँ मैं बस,
अकेली तन्हा बंधी इस प्यास में.
बरसती हूँ बनके,
काली घटा हर रोज,
मेरी बूंदों को मगर,
बस मिली है ये बंजर जमीन.
बरसों से सजती आ रही हूँ,
जिस आईने के सामने,
वो भी कहने लगा है कि,
मुझमे ही कोई हैं कमीं.
इठलाती-बलखाती,
नदियाँ थी कभी मैं,
आज बस मंथर,स्थूल,
एक प्रवाह रह गई हूँ मै, परमित……Crassa