वो महफ़िल में बसी हैं, अपने हुस्न को लेकर,
और पिला रहीं हैं सभी को, ओठों से छलका-छलका कर.
मैं चलता हूँ राहों में, हर कांटे को उठा कर,
जाने कब गुजरेंगी माएँ, नंगे पावँ चलकर.
है जावेद को घमंड जिस मुंबई के योवन पर,
रोज दान करते हैं हम उसे, परमित गंगा में नहा कर….Crassa