जिन्दगी


धुवाँ-धुवाँ सी हैं जिन्दगी,
कभी जमीं तो कभी,
आसमां पे है जिन्दगी.
सजाती तो है रोज वो खुद को,
आइना देख के,
कभी हसरते-जवानी,
तो कभी बाजारू-दारु है जिन्दगी, परमित.

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