हम अगर कर्ज न उतारे,
तो फिर हमारी शोहरत ही क्या.
हम अगर दीप न जलाएँ,
तो फिर हमारी नियत ही क्या.
उठती लहरें गिरती हैं,
किसी न किसी किनारें से,
हम अगर लहरों को न रोकें.
तो फिर हमारी सरहद ही क्या.
खिलता हुआ यौवन लेकर,
वो तोडती हैं बस शीशा.
हम अगर बंजर को हरियाली न दें,
तो फिर हमारी जवानी ही क्या, परमित.