काली रातों की यादें


ए चाँद तुझसे क्या कहें,
कैसी कटीं हैं रातें,
मैं उमरती थी नदी की तरह,
वो बाँध गयें किनारें-2.
फूलों के ख़्वाबों का,
भी नहीं हैं ये मंजर,
पलकों-से-पावों तक,
वो दे गयें हैं यादें-2.
बिन सवान के बरसातें,
बिन साज बजी मल्हार,
मैं जितना ही इतराती,
वो साध गयें निशाने-2.
कब भोर हुई पलकों में,
कब सांझ ढली आके,
मैं कुछ जान न पाई,
वो इस कदर पीने लगे प्याले-2.
पायल भी जली इर्ष्या के अगन में,
चूड़ी दूर हुई साजन की राहों से,
मैं फँसी इस कदर भंवर में, परमित
वो ले गये बहा के शर्म की मेरी दीवारें-2.

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