मुझे दर्द का,
पता भी नहीं,
और आँखे मेरी,
छलकने लगी.
बड़ी बेवफा,
मेरी महबूबा,
मइयत पे ही मेरी,
वो निगाहें लड़ाने लगी.
शिकवा करें,
तो किस से करें,
जिसे अपना कहा था,
वो गैरों की बाहों में,
अब सिमटने लगी, परमित.
मुझे दर्द का,
पता भी नहीं,
और आँखे मेरी,
छलकने लगी.
बड़ी बेवफा,
मेरी महबूबा,
मइयत पे ही मेरी,
वो निगाहें लड़ाने लगी.
शिकवा करें,
तो किस से करें,
जिसे अपना कहा था,
वो गैरों की बाहों में,
अब सिमटने लगी, परमित.