हवा


अनजान हैं कितने ही इस गुलिश्ता में,
चाँद तो सबका ही है दोस्तों ,
जिस दिन जावानी ढल जायेगी,
उतर आयेंगे किसी के आँगन में, दोस्तों.
ढलकता हैं आँचल रह-रह कर,
हवा ही कुछ इस कदर चल रही है,
जिस दिन तन भी ढलने लगेगा,
आँचल भी संभल लेंगे, परमित.

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