जिस दिन समर में मैं कूदा दोस्तों,
सूरज प्रखर हुआ और,
बादल छट गये दोस्तों।
दुश्मनों कि निगाहें, है मुझ पे गड़ीं,
और मेरी नज़रों ने भी निशाना है साधा दोस्तों।
रक्त कि बूंदें थिरकने लगी हैं तन पे,
और जख्मों ने किया मेरा चुम्बन दोस्तों।
मेरा अंत ही है उनका इति श्री,
और उनका अंत ही मेरा जीवन दोस्तों।
खेलें हैं वो भी आँचल में कितने,
खेला हूँ मैं भी अपनी माँ के गोद में,
शीश कटेगा अब मेरा या,
फिर होगा परमीत मेरा शंखनाद दोस्तों।