माँ


एक बेवफा ने लुटा,
मोहब्बत में हमको पिला के,
हर मोड़ पे गिर रहा हूँ,
जवानी में ही मैं लड़खड़ा के.
एक -एक चोट पे मेरे छलकता है,
दर्द पिता कि आँखों में,
और मुस्कुराता है यार मेरा,
मेरे जख्मो पे एक नयी अदा से.
एक बेवफा ने हाँ लुटा,
आँचल में अपने सुला के,
भटकने लगा हूँ अब,
अपनी ही गलियों में आके.
जिसके लिए परमीत ने छोड़ा,
अपनी माँ को रोते हुए,
आज माँ ही बैठी है उसके,
जख्मों को अपने सीने पे लेके.

Leave a comment