हुस्न और खंजर


 

आज आँखों से पिलाया है,
कल ओठों से पिलायेंगी,
उस दिन समझोगे मोहब्बत को,
जब सीने में खंजर को उतरेंगी।
न छलक ही पायेगा आँखों से पानी,
न ओठों से ही कुछ कह पावोगे,
आज बाहों में सुलाया है,
कल राहों में दुत्कारेंगी,
उस दिन समझोगे मोहब्बत को,
जब बाजार में लायेंगी।
जिसके मुस्कान पे छोड़ा है घर और द्वार,
वो ही मुस्करा कर दर-दर पे नचाएंगी,
आज गोद में बिठाया है,
कल पावों कि ठोकर लगायेंगी।
उस दिन समझोगे परमीत मोहब्बत को,
जब हुस्न का असली रंग वो दिखाएंगी।

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