कलम और तन्हाई


इस कदर लूट के मेरी तन्हाई मुझे
तुम हंसती हो मुझपे मेरे ही द्वार पे,
सुख गयी मेरी कलम जिस,
तेरी योवन को सजाते-सजाते,
और तू आज भी आती है,
मेरे पास है तो बिना श्रृंगार के.
सोचा था जिन ख़्वाबों को हकीकत,
बना के सजाऊंगा उनकी जुल्फों में,
वो ही हंसती हैं मेरी काली रातो पे,
निराश हो गयी मेरी कलम,
जिस आशा को लिखते-लिखते,
और तू आज भी आती है,
मेरे पास है तो वो ही सब्जबाग ले के, परमीत

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