वक्त बदलते देर नहीं हैं,
रक्त के बहते देर नहीं हैं,
वीरों कि धरती है ये,
यहाँ आग सुलगते देर नहीं हैं,
पल में तलवारे निकल पड़ती हैं,
पल में कटारें बीछ जाती हैं,
गंगा कि लहरो पे बसी है ये धरती,
यहाँ शादी के मंडप में,
रणभूमि के सजते देर नहीं, परमीत