अंतर्द्वंद


 

 

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बड़ी विचित्र स्तिथि है मेरी,
जिंदगी कि चाह भी है,
और,
मौत का इंतज़ार भी.
खुद से मोहब्बत भी है,
खुद से ही नफरत भी.
आस्तिक हूँ या नास्तिक,
मैं खुद ही समझ नहीं पाता,
कभी खुदा कि इबादत होती है,
तो,
कभी खुदा से बगावत भी.
इंसान हूँ या जानवर,
खुद ही समझ नहीं पाता,
कभी जलता हूँ मोहब्बत में,
तो,
कभी बदले कि आग में, परमीत.

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